By Malay Ojha | Published: 05 June 2026 | 05:23 PM
पीएचडी करने वाले शोधार्थियों के लिए बड़ा बदलाव सामने आया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने शोध कार्यों में बढ़ती नकल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के गलत इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। नए नियमों के तहत अगर किसी शोध प्रबंध में 60 प्रतिशत से अधिक साहित्यिक चोरी पाई जाती है तो शोधार्थी का पंजीकरण तक रद्द किया जा सकता है। साथ ही शोध मार्गदर्शकों पर भी कार्रवाई का प्रावधान किया गया है।
उच्च शिक्षा संस्थानों में शोध की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने प्लेजरिज्म को लेकर सख्त रुख अपनाया है। आयोग का कहना है कि शोध कार्य पूरी तरह मौलिक होना चाहिए और किसी भी प्रकार की नकल को गंभीर शैक्षणिक अपराध माना जाएगा। इसी को ध्यान में रखते हुए विभिन्न स्तरों पर दंड का प्रावधान किया गया है।
10 से 40 प्रतिशत नकल मिलने पर क्या होगा?
नए नियमों के अनुसार यदि किसी शोध प्रबंध में 10 प्रतिशत से लेकर 40 प्रतिशत तक साहित्यिक चोरी पाई जाती है तो थीसिस को सीधे अस्वीकार नहीं किया जाएगा। शोधार्थी को आवश्यक सुधार करने का अवसर मिलेगा और वह छह महीने के भीतर संशोधित शोध प्रबंध दोबारा जमा कर सकेगा।
40 प्रतिशत से अधिक नकल पर बढ़ेगी मुश्किल
यदि जांच के दौरान किसी शोध प्रबंध में 40 से 60 प्रतिशत तक नकल पाई जाती है तो संबंधित शोधार्थी को एक वर्ष तक थीसिस जमा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस दौरान उसे अपने शोध कार्य में व्यापक सुधार करना होगा और निर्धारित प्रक्रिया के बाद ही दोबारा आवेदन करने का मौका मिलेगा।
60 प्रतिशत से ज्यादा नकल पर रजिस्ट्रेशन रद्द
आयोग ने सबसे कठोर प्रावधान उन मामलों के लिए रखा है जिनमें साहित्यिक चोरी का स्तर 60 प्रतिशत से अधिक पाया जाता है। ऐसी स्थिति में शोधार्थी का पंजीकरण रद्द किया जा सकता है। यूजीसी का मानना है कि इस कदम से शोध क्षेत्र में ईमानदारी और गुणवत्ता दोनों को बढ़ावा मिलेगा।
केवल शोधार्थी नहीं, मार्गदर्शक भी होंगे जिम्मेदार
नए दिशा-निर्देशों में यह स्पष्ट किया गया है कि शोध कार्य की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी केवल शोधार्थी की नहीं होगी। यदि किसी मामले में गंभीर स्तर की नकल सामने आती है या बार-बार ऐसी घटनाएं होती हैं तो संबंधित शोध मार्गदर्शक के खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।
शोध मार्गदर्शकों पर क्या कार्रवाई संभव?
आयोग के अनुसार नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर शोध मार्गदर्शकों को नए शोधार्थियों का मार्गदर्शन करने से रोका जा सकता है। गंभीर मामलों में उनकी मान्यता भी समाप्त की जा सकती है। इससे शोध कार्यों की निगरानी और जवाबदेही दोनों मजबूत होने की उम्मीद है।
एआई के इस्तेमाल पर भी साफ नीति
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए आयोग ने इसके उपयोग को लेकर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। भाषा सुधार, व्याकरण जांच और लेखन को बेहतर बनाने जैसे सामान्य कार्यों के लिए एआई का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन इसका उल्लेख शोध प्रबंध में करना अनिवार्य होगा।
शोध निष्कर्ष तैयार करने में एआई पर रोक
यूजीसी ने साफ कहा है कि शोध के निष्कर्ष निकालने, डेटा विश्लेषण करने, सारांश तैयार करने या शोध के मूल निष्कर्ष लिखने के लिए एआई से प्राप्त सामग्री का उपयोग स्वीकार नहीं किया जाएगा। आयोग का मानना है कि शोध का बौद्धिक योगदान पूरी तरह शोधार्थी का होना चाहिए।
विश्वविद्यालयों को भी दिए गए निर्देश
आयोग ने देशभर के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों से कहा है कि वे शोधार्थियों को इन नियमों की पूरी जानकारी दें। साथ ही शोध प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और मौलिकता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं विकसित करें।
शोध की गुणवत्ता बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि नए नियम लागू होने के बाद शोध कार्यों में नकल की घटनाओं में कमी आएगी और उच्च शिक्षा संस्थानों में शोध की विश्वसनीयता बढ़ेगी। साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार उपयोग को भी बढ़ावा मिलेगा, जिससे शोध का स्तर और अधिक मजबूत हो सकेगा।



