Saturday, August 22, 2026
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रांची यूनिवर्सिटी में PhD के नियम बदले, 75% वाले चार साल की ग्रेजुएशन के बाद सीधे कर सकेंगे दाखिला

By Malay Ojha | Published: 20 August 2026 | 03:26 PM

नई शिक्षा नीति 2020 और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 2022 के नियमों के अनुरूप रांची विश्वविद्यालय ने पीएचडी में दाखिले की व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है। अब चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम में 75 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले विद्यार्थियों के लिए पीएचडी में जाने का रास्ता सीधे खुल जाएगा। ऐसे विद्यार्थियों के लिए स्नातकोत्तर डिग्री की अनिवार्यता नहीं होगी। विश्वविद्यालय ने करीब डेढ़ दशक बाद पीएचडी से जुड़े नियमों में व्यापक बदलाव करते हुए नई व्यवस्था लागू की है।

नए नियम का सबसे बड़ा बदलाव चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम पूरा करने वाले विद्यार्थियों को लेकर है। अब अगर किसी विद्यार्थी ने चार साल की ग्रेजुएशन पूरी की है और उसके कम से कम 75 प्रतिशत अंक हैं, तो वह स्नातकोत्तर किए बिना पीएचडी में दाखिले के लिए आवेदन कर सकेगा। यानी ऐसे विद्यार्थियों को पहले मास्टर डिग्री पूरी करने की जरूरत नहीं होगी।

यह बदलाव नई शिक्षा नीति के तहत तैयार किए गए चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में शोध को बढ़ावा देने की दिशा में अहम माना जा रहा है। रांची विश्वविद्यालय भी चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में शोध से जुड़े पाठ्यक्रम लागू कर चुका है। विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम दस्तावेजों में शोध पाठ्यक्रम के लिए 12 क्रेडिट की व्यवस्था भी दर्ज है।

स्नातकोत्तर वालों के लिए 55 प्रतिशत की शर्त
जिन विद्यार्थियों के पास चार वर्षीय स्नातक की जगह सामान्य स्नातक के बाद स्नातकोत्तर डिग्री है, उनके लिए पात्रता का अलग नियम रहेगा। नए प्रावधान के अनुसार स्नातकोत्तर या एमफिल में कम से कम 55 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले विद्यार्थी पीएचडी के लिए पात्र होंगे।

आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों को न्यूनतम अंकों में पांच प्रतिशत की छूट मिलेगी। इस तरह पात्रता के लिए जरूरी 55 प्रतिशत अंक घटकर 50 प्रतिशत हो जाएंगे। यह व्यवस्था विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पीएचडी संबंधी प्रावधानों के अनुरूप है। रांची विश्वविद्यालय के मौजूदा पीएचडी प्रवेश दिशा-निर्देशों में भी 55 प्रतिशत और आरक्षित वर्गों के लिए पांच प्रतिशत छूट का प्रावधान दर्ज है।

चार साल की ग्रेजुएशन वालों को भी प्रवेश परीक्षा देनी पड़ सकती है
चार वर्षीय स्नातक में 75 प्रतिशत अंक हासिल करने से पीएचडी के लिए शैक्षणिक पात्रता पूरी होगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर विद्यार्थी को बिना किसी चयन प्रक्रिया के सीट मिल जाएगी। विश्वविद्यालय की प्रवेश प्रक्रिया और उपलब्ध सीटों के आधार पर चयन की प्रक्रिया लागू होगी।

वहीं स्नातकोत्तर या एमफिल के आधार पर आवेदन करने वाले पात्र विद्यार्थियों को पीएचडी प्रवेश परीक्षा में शामिल होना होगा। प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार के प्रदर्शन के आधार पर अंतिम चयन किया जाएगा।

नेट और जेआरएफ वालों को बड़ी राहत
पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा और कनिष्ठ शोध अध्येता परीक्षा पास करने वाले अभ्यर्थियों को राहत दी गई है। ऐसे अभ्यर्थियों को विश्वविद्यालय की पीएचडी प्रवेश परीक्षा में बैठने से छूट मिलेगी। उनका चयन साक्षात्कार के आधार पर किया जाएगा।

रांची विश्वविद्यालय से जुड़ी मौजूदा प्रवेश जानकारी में भी राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा, शोध अध्येता पात्रता और अन्य मान्य शोध परीक्षाओं में सफल अभ्यर्थियों को लिखित प्रवेश परीक्षा से छूट दिए जाने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।

प्रवेश परीक्षा में शोध पद्धति और विषय से होंगे सवाल
जो विद्यार्थी विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा के जरिए पीएचडी में जाना चाहते हैं, उनके लिए परीक्षा का ढांचा भी तय किया गया है। प्रश्नपत्र में आधे सवाल शोध पद्धति से और बाकी आधे सवाल संबंधित विषय से पूछे जाएंगे। इस व्यवस्था का मकसद सिर्फ विषय की जानकारी जांचना नहीं, बल्कि यह देखना भी है कि विद्यार्थी शोध की बुनियादी प्रक्रिया, शोध पद्धति और अकादमिक कामकाज को कितना समझता है।

परीक्षा और साक्षात्कार के अंकों से होगा चयन
पीएचडी में प्रवेश के लिए लिखित परीक्षा और साक्षात्कार दोनों को महत्व दिया गया है। अंतिम चयन में प्रवेश परीक्षा को 70 प्रतिशत और साक्षात्कार को 30 प्रतिशत अंक का महत्व दिया जाएगा।

इस व्यवस्था में लिखित परीक्षा अभ्यर्थी की विषयगत समझ और शोध क्षमता का आकलन करेगी, जबकि साक्षात्कार के दौरान उसके शोध प्रस्ताव, विषय की समझ और शोध करने की क्षमता को परखा जाएगा। रांची विश्वविद्यालय की पीएचडी प्रवेश संबंधी उपलब्ध जानकारी में भी 70:30 के अनुपात का उल्लेख मिलता है।

पीएचडी शुरू करने के बाद 12 क्रेडिट का कोर्स वर्क
नए नियमों में पीएचडी में दाखिले के बाद कोर्स वर्क को भी जरूरी रखा गया है। शोधार्थियों को कम से कम 12 क्रेडिट का कोर्स वर्क पूरा करना होगा। इसमें शोध पद्धति जैसे जरूरी हिस्सों को शामिल किया जाएगा।

कोर्स वर्क का उद्देश्य शोधार्थियों को शोध की तकनीक, अकादमिक लेखन, शोध नैतिकता और विषय से जुड़े जरूरी अकादमिक कौशल से परिचित कराना है। पीएचडी कार्यक्रमों में 12 क्रेडिट के कोर्स वर्क का प्रावधान नई शोध व्यवस्था का अहम हिस्सा है।

कम से कम तीन साल में पूरी करनी होगी पीएचडी
नई व्यवस्था में पीएचडी पूरी करने की न्यूनतम अवधि तीन साल यानी 36 महीने रखी गई है। वहीं सामान्य स्थिति में शोधार्थी को अधिकतम छह साल के भीतर अपना शोध पूरा करना होगा।

अगर निर्धारित अवधि में शोध पूरा नहीं हो पाता है तो दोबारा पंजीकरण की व्यवस्था के तहत अतिरिक्त समय मिल सकता है। इस तरह विशेष परिस्थितियों में पीएचडी पूरी करने की कुल अवधि आठ साल तक जा सकती है।

महिलाओं और दिव्यांग शोधार्थियों को अतिरिक्त समय
नए नियमों में महिला शोधार्थियों और 40 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता वाले शोधार्थियों के लिए अतिरिक्त राहत का प्रावधान किया गया है। इन्हें अधिकतम अवधि में दो साल तक अतिरिक्त छूट मिल सकती है।

इसका उद्देश्य उन शोधार्थियों को अतिरिक्त समय देना है जिन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों, स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों या अन्य व्यावहारिक कारणों से शोध पूरा करने में सामान्य अवधि से अधिक समय लग सकता है। पीएचडी नियमों में महिला और 40 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता वाले शोधार्थियों के लिए अतिरिक्त दो साल की व्यवस्था अन्य विश्वविद्यालयों की मौजूदा नियमावली में भी दिखाई देती है।

महिला शोधार्थियों के लिए 240 दिन की छुट्टी
महिला शोधार्थियों के लिए मातृत्व और बच्चे की देखभाल से जुड़ी छुट्टी का भी प्रावधान किया गया है। इसके तहत पूरे पीएचडी कार्यक्रम के दौरान 240 दिन तक मातृत्व या बच्चे की देखभाल के लिए छुट्टी दी जा सकेगी।

इससे महिला शोधार्थियों को पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण शोध बीच में छोड़ने की स्थिति से बचाने में मदद मिलेगी। ऐसी छुट्टी की व्यवस्था विश्वविद्यालयों की नई पीएचडी नियमावलियों में शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण सहायता के तौर पर शामिल की जा रही है।

करीब डेढ़ दशक बाद बदले पीएचडी के नियम
रांची विश्वविद्यालय में लंबे समय बाद पीएचडी से जुड़े नियमों में व्यापक बदलाव किया गया है। नई व्यवस्था में प्रवेश से लेकर परीक्षा, साक्षात्कार, कोर्स वर्क और शोध पूरा करने की अवधि तक कई स्तरों पर बदलाव किए गए हैं।

सबसे अहम बात यह है कि चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम में 75 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले विद्यार्थियों के लिए पीएचडी तक पहुंचने का रास्ता अब छोटा हो गया है। उन्हें पहले स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करने की अनिवार्यता से राहत मिलेगी। इससे चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में शोध को चुनने वाले विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर बढ़ सकता है।

नई व्यवस्था का असर आने वाले सत्रों में पीएचडी की पात्रता और प्रवेश प्रक्रिया पर दिखाई देगा। विद्यार्थियों को आवेदन करने से पहले संबंधित विषय, सीटों, प्रवेश परीक्षा और विश्वविद्यालय की ओर से जारी अंतिम प्रवेश सूचना को ध्यान से देखना होगा।

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रांची यूनिवर्सिटी में PhD के नियम बदले, 75% वाले चार साल की ग्रेजुएशन के बाद सीधे कर सकेंगे दाखिला

By Malay Ojha | Published: 20 August 2026 | 03:26 PM

नई शिक्षा नीति 2020 और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 2022 के नियमों के अनुरूप रांची विश्वविद्यालय ने पीएचडी में दाखिले की व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है। अब चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम में 75 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले विद्यार्थियों के लिए पीएचडी में जाने का रास्ता सीधे खुल जाएगा। ऐसे विद्यार्थियों के लिए स्नातकोत्तर डिग्री की अनिवार्यता नहीं होगी। विश्वविद्यालय ने करीब डेढ़ दशक बाद पीएचडी से जुड़े नियमों में व्यापक बदलाव करते हुए नई व्यवस्था लागू की है।

नए नियम का सबसे बड़ा बदलाव चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम पूरा करने वाले विद्यार्थियों को लेकर है। अब अगर किसी विद्यार्थी ने चार साल की ग्रेजुएशन पूरी की है और उसके कम से कम 75 प्रतिशत अंक हैं, तो वह स्नातकोत्तर किए बिना पीएचडी में दाखिले के लिए आवेदन कर सकेगा। यानी ऐसे विद्यार्थियों को पहले मास्टर डिग्री पूरी करने की जरूरत नहीं होगी।

यह बदलाव नई शिक्षा नीति के तहत तैयार किए गए चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में शोध को बढ़ावा देने की दिशा में अहम माना जा रहा है। रांची विश्वविद्यालय भी चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में शोध से जुड़े पाठ्यक्रम लागू कर चुका है। विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम दस्तावेजों में शोध पाठ्यक्रम के लिए 12 क्रेडिट की व्यवस्था भी दर्ज है।

स्नातकोत्तर वालों के लिए 55 प्रतिशत की शर्त
जिन विद्यार्थियों के पास चार वर्षीय स्नातक की जगह सामान्य स्नातक के बाद स्नातकोत्तर डिग्री है, उनके लिए पात्रता का अलग नियम रहेगा। नए प्रावधान के अनुसार स्नातकोत्तर या एमफिल में कम से कम 55 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले विद्यार्थी पीएचडी के लिए पात्र होंगे।

आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों को न्यूनतम अंकों में पांच प्रतिशत की छूट मिलेगी। इस तरह पात्रता के लिए जरूरी 55 प्रतिशत अंक घटकर 50 प्रतिशत हो जाएंगे। यह व्यवस्था विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पीएचडी संबंधी प्रावधानों के अनुरूप है। रांची विश्वविद्यालय के मौजूदा पीएचडी प्रवेश दिशा-निर्देशों में भी 55 प्रतिशत और आरक्षित वर्गों के लिए पांच प्रतिशत छूट का प्रावधान दर्ज है।

चार साल की ग्रेजुएशन वालों को भी प्रवेश परीक्षा देनी पड़ सकती है
चार वर्षीय स्नातक में 75 प्रतिशत अंक हासिल करने से पीएचडी के लिए शैक्षणिक पात्रता पूरी होगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर विद्यार्थी को बिना किसी चयन प्रक्रिया के सीट मिल जाएगी। विश्वविद्यालय की प्रवेश प्रक्रिया और उपलब्ध सीटों के आधार पर चयन की प्रक्रिया लागू होगी।

वहीं स्नातकोत्तर या एमफिल के आधार पर आवेदन करने वाले पात्र विद्यार्थियों को पीएचडी प्रवेश परीक्षा में शामिल होना होगा। प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार के प्रदर्शन के आधार पर अंतिम चयन किया जाएगा।

नेट और जेआरएफ वालों को बड़ी राहत
पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा और कनिष्ठ शोध अध्येता परीक्षा पास करने वाले अभ्यर्थियों को राहत दी गई है। ऐसे अभ्यर्थियों को विश्वविद्यालय की पीएचडी प्रवेश परीक्षा में बैठने से छूट मिलेगी। उनका चयन साक्षात्कार के आधार पर किया जाएगा।

रांची विश्वविद्यालय से जुड़ी मौजूदा प्रवेश जानकारी में भी राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा, शोध अध्येता पात्रता और अन्य मान्य शोध परीक्षाओं में सफल अभ्यर्थियों को लिखित प्रवेश परीक्षा से छूट दिए जाने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।

प्रवेश परीक्षा में शोध पद्धति और विषय से होंगे सवाल
जो विद्यार्थी विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा के जरिए पीएचडी में जाना चाहते हैं, उनके लिए परीक्षा का ढांचा भी तय किया गया है। प्रश्नपत्र में आधे सवाल शोध पद्धति से और बाकी आधे सवाल संबंधित विषय से पूछे जाएंगे। इस व्यवस्था का मकसद सिर्फ विषय की जानकारी जांचना नहीं, बल्कि यह देखना भी है कि विद्यार्थी शोध की बुनियादी प्रक्रिया, शोध पद्धति और अकादमिक कामकाज को कितना समझता है।

परीक्षा और साक्षात्कार के अंकों से होगा चयन
पीएचडी में प्रवेश के लिए लिखित परीक्षा और साक्षात्कार दोनों को महत्व दिया गया है। अंतिम चयन में प्रवेश परीक्षा को 70 प्रतिशत और साक्षात्कार को 30 प्रतिशत अंक का महत्व दिया जाएगा।

इस व्यवस्था में लिखित परीक्षा अभ्यर्थी की विषयगत समझ और शोध क्षमता का आकलन करेगी, जबकि साक्षात्कार के दौरान उसके शोध प्रस्ताव, विषय की समझ और शोध करने की क्षमता को परखा जाएगा। रांची विश्वविद्यालय की पीएचडी प्रवेश संबंधी उपलब्ध जानकारी में भी 70:30 के अनुपात का उल्लेख मिलता है।

पीएचडी शुरू करने के बाद 12 क्रेडिट का कोर्स वर्क
नए नियमों में पीएचडी में दाखिले के बाद कोर्स वर्क को भी जरूरी रखा गया है। शोधार्थियों को कम से कम 12 क्रेडिट का कोर्स वर्क पूरा करना होगा। इसमें शोध पद्धति जैसे जरूरी हिस्सों को शामिल किया जाएगा।

कोर्स वर्क का उद्देश्य शोधार्थियों को शोध की तकनीक, अकादमिक लेखन, शोध नैतिकता और विषय से जुड़े जरूरी अकादमिक कौशल से परिचित कराना है। पीएचडी कार्यक्रमों में 12 क्रेडिट के कोर्स वर्क का प्रावधान नई शोध व्यवस्था का अहम हिस्सा है।

कम से कम तीन साल में पूरी करनी होगी पीएचडी
नई व्यवस्था में पीएचडी पूरी करने की न्यूनतम अवधि तीन साल यानी 36 महीने रखी गई है। वहीं सामान्य स्थिति में शोधार्थी को अधिकतम छह साल के भीतर अपना शोध पूरा करना होगा।

अगर निर्धारित अवधि में शोध पूरा नहीं हो पाता है तो दोबारा पंजीकरण की व्यवस्था के तहत अतिरिक्त समय मिल सकता है। इस तरह विशेष परिस्थितियों में पीएचडी पूरी करने की कुल अवधि आठ साल तक जा सकती है।

महिलाओं और दिव्यांग शोधार्थियों को अतिरिक्त समय
नए नियमों में महिला शोधार्थियों और 40 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता वाले शोधार्थियों के लिए अतिरिक्त राहत का प्रावधान किया गया है। इन्हें अधिकतम अवधि में दो साल तक अतिरिक्त छूट मिल सकती है।

इसका उद्देश्य उन शोधार्थियों को अतिरिक्त समय देना है जिन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों, स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों या अन्य व्यावहारिक कारणों से शोध पूरा करने में सामान्य अवधि से अधिक समय लग सकता है। पीएचडी नियमों में महिला और 40 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता वाले शोधार्थियों के लिए अतिरिक्त दो साल की व्यवस्था अन्य विश्वविद्यालयों की मौजूदा नियमावली में भी दिखाई देती है।

महिला शोधार्थियों के लिए 240 दिन की छुट्टी
महिला शोधार्थियों के लिए मातृत्व और बच्चे की देखभाल से जुड़ी छुट्टी का भी प्रावधान किया गया है। इसके तहत पूरे पीएचडी कार्यक्रम के दौरान 240 दिन तक मातृत्व या बच्चे की देखभाल के लिए छुट्टी दी जा सकेगी।

इससे महिला शोधार्थियों को पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण शोध बीच में छोड़ने की स्थिति से बचाने में मदद मिलेगी। ऐसी छुट्टी की व्यवस्था विश्वविद्यालयों की नई पीएचडी नियमावलियों में शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण सहायता के तौर पर शामिल की जा रही है।

करीब डेढ़ दशक बाद बदले पीएचडी के नियम
रांची विश्वविद्यालय में लंबे समय बाद पीएचडी से जुड़े नियमों में व्यापक बदलाव किया गया है। नई व्यवस्था में प्रवेश से लेकर परीक्षा, साक्षात्कार, कोर्स वर्क और शोध पूरा करने की अवधि तक कई स्तरों पर बदलाव किए गए हैं।

सबसे अहम बात यह है कि चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम में 75 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले विद्यार्थियों के लिए पीएचडी तक पहुंचने का रास्ता अब छोटा हो गया है। उन्हें पहले स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करने की अनिवार्यता से राहत मिलेगी। इससे चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में शोध को चुनने वाले विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर बढ़ सकता है।

नई व्यवस्था का असर आने वाले सत्रों में पीएचडी की पात्रता और प्रवेश प्रक्रिया पर दिखाई देगा। विद्यार्थियों को आवेदन करने से पहले संबंधित विषय, सीटों, प्रवेश परीक्षा और विश्वविद्यालय की ओर से जारी अंतिम प्रवेश सूचना को ध्यान से देखना होगा।

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