By Malay Ojha | Published: 22 August 2026 | 11:02 AM
कानून की पढ़ाई पूरी करके सिविल जज बनने का सपना देख रहे युवाओं के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने एंट्री लेवल न्यायिक सेवा में जाने के लिए तीन साल की अनिवार्य वकालत की शर्त को घटाकर एक साल कर दिया है। हालांकि, चयन के बाद उम्मीदवारों को सीधे जज की कुर्सी नहीं मिलेगी। उन्हें पहले प्रशिक्षण और फिर एक साल की संरचित क्लर्कशिप पूरी करनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने मई 2025 के फैसले की मूल सोच को बरकरार रखा है कि न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों को अदालत और वकालत का व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए। लेकिन अदालत ने यह भी माना कि अचानक तीन साल की प्रैक्टिस अनिवार्य करने से बड़ी संख्या में कानून स्नातकों और युवा वकीलों को परेशानी हुई। इसी को देखते हुए अदालत ने पुराने फैसले में बदलाव किया है।
मार्च 2027 तक बिना प्रैक्टिस भी मौका
इस फैसले का सबसे अहम हिस्सा संक्रमणकालीन व्यवस्था है। 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 तक जारी होने वाली सिविल जज भर्ती अधिसूचनाओं के लिए उम्मीदवारों को तीन साल की वकालत तो दूर, अलग से एक साल की प्रैक्टिस का प्रमाण भी नहीं देना होगा। अदालत ने इस अवधि के उम्मीदवारों को आवेदन के लिए एक साल की सक्रिय प्रैक्टिस पूरी मानने का निर्देश दिया है।
चयन हुआ तो तुरंत जज नहीं बनेंगे
हालांकि इस राहत का मतलब यह नहीं है कि परीक्षा पास करते ही उम्मीदवार नियमित न्यायिक अधिकारी बन जाएंगे। ऐसे उम्मीदवारों को पहले प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी के रूप में रखा जाएगा। उन्हें संबंधित राज्य की न्यायिक अकादमी में एक साल का गहन प्रशिक्षण लेना होगा। इसके बाद एक साल की संरचित कानून क्लर्कशिप पूरी करनी होगी।
क्लर्कशिप में भी अदालत का सीधा अनुभव
क्लर्कशिप को भी दो हिस्सों में बांटा गया है। पहले छह महीने उम्मीदवार जिला न्यायाधीश या उच्चतर न्यायिक सेवा के अधिकारी के साथ काम करेंगे। इसके बाद अगले छह महीने संबंधित उच्च न्यायालय के मौजूदा न्यायाधीश की निगरानी में रहेंगे। यानी अदालत ने सिर्फ किताबों की पढ़ाई के बजाय उम्मीदवारों को वास्तविक न्यायिक कामकाज से जोड़ने पर जोर दिया है।
1 अप्रैल 2027 के बाद क्या बदलेगा?
संक्रमणकालीन अवधि खत्म होने के बाद नियम फिर स्पष्ट तरीके से लागू होगा। 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं में सिविल जज बनने के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवार के पास कम से कम एक साल की सक्रिय वकालत का अनुभव होना जरूरी होगा। इस प्रैक्टिस की पुष्टि निर्धारित प्रमाण पत्र और अदालत में उम्मीदवार की वास्तविक भागीदारी के आधार पर की जाएगी।
चयन के बाद दो साल की तैयारी
भविष्य में भी केवल एक साल की वकालत पूरी करना पर्याप्त नहीं होगा। चयनित उम्मीदवार को पहले एक साल की न्यायिक अकादमी ट्रेनिंग और उसके बाद एक साल की संरचित क्लर्कशिप करनी होगी। क्लर्कशिप के छह महीने जिला स्तर पर और अगले छह महीने उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की निगरानी में पूरे किए जाएंगे। संतोषजनक मूल्यांकन के बाद ही उम्मीदवार को नियमित पद पर नियुक्त किया जाएगा।
कोर्ट ने प्रैक्टिस की जरूरत पूरी तरह खत्म क्यों नहीं की?
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि न्यायिक अधिकारी का काम केवल कानून की किताबों का ज्ञान रखने से पूरा नहीं होता। अदालत में होने वाली बहस, दस्तावेजों की जांच, गवाहों से जुड़ी प्रक्रिया और न्यायिक कामकाज की वास्तविक समझ भी जरूरी है। इसलिए अदालत ने प्रैक्टिस की जरूरत को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसकी अवधि कम की है और चयन के बाद प्रशिक्षण तथा क्लर्कशिप को व्यवस्था का अहम हिस्सा बनाया है।
मई 2025 के फैसले में क्या था?
दरअसल, मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एंट्री लेवल न्यायिक सेवा में सीधे भर्ती होने वाले उम्मीदवारों के लिए कम से कम तीन साल की कानूनी प्रैक्टिस अनिवार्य कर दी थी। इस फैसले के बाद नए कानून स्नातकों के सामने यह समस्या खड़ी हो गई थी कि पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें न्यायिक सेवा परीक्षा में बैठने से पहले लंबे समय तक वकालत करनी होगी। इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई थीं।
पुनर्विचार याचिका पर 2:1 से फैसला
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने की। फैसला 2:1 के बहुमत से आया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति मसीह बहुमत में रहे, जबकि न्यायमूर्ति विनोद चंद्रन ने असहमति जताई और पुराने तीन साल वाले नियम को बरकरार रखने के पक्ष में रहे।
कानून स्नातकों के लिए क्या बदला?
इस फैसले का सीधा असर न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे कानून स्नातकों पर पड़ेगा। खासकर मार्च 2027 तक जारी होने वाली भर्तियों में उन्हें तीन साल की वकालत के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा। वहीं, आगे चलकर एक साल की वास्तविक वकालत के बाद परीक्षा में बैठने का रास्ता खुलेगा। लेकिन चयन के बाद दो साल का प्रशिक्षण और क्लर्कशिप पूरा करना अनिवार्य रहेगा।
अभी अंतिम तस्वीर नहीं, आगे समीक्षा भी होगी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि नई व्यवस्था को हमेशा के लिए पत्थर की लकीर नहीं माना गया है। अदालत के अनुसार, व्यवस्था लागू होने के बाद भर्ती की गुणवत्ता, प्रशिक्षण की उपयोगिता, क्लर्कशिप का असर और नियुक्त न्यायिक अधिकारियों के प्रदर्शन का आकलन किया जाएगा। पर्याप्त संस्थागत अनुभव मिलने के बाद जरूरत पड़ने पर इस व्यवस्था की दोबारा समीक्षा की जा सकती है।
युवाओं के लिए राहत, लेकिन जिम्मेदारी भी बढ़ी
कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने न्यायिक सेवा में प्रवेश की बाधा को काफी हद तक कम किया है, लेकिन व्यावहारिक अनुभव की जरूरत को खत्म नहीं किया। अब रास्ता यह होगा कि उम्मीदवार कम अवधि की वकालत के बाद परीक्षा दे सकें और चयन के बाद न्यायिक अकादमी तथा अदालतों में काम करके जरूरी अनुभव हासिल करें। यानी सिविल जज बनने की राह पहले से आसान जरूर हुई है, लेकिन अदालत ने प्रशिक्षण और काम के जरिए उम्मीदवारों को परखने की जिम्मेदारी भी तय कर दी है।



