भारत में मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस और बीडीएस जैसे कोर्स में दाखिला आमतौर पर नीट यूजी परीक्षा के जरिए होता है। यह परीक्षा छात्रों की विज्ञान समझ, तर्क क्षमता और दबाव में प्रदर्शन करने की योग्यता को परखने का माध्यम मानी जाती है। हालांकि हाल में नीट यूजी पेपर लीक विवाद के बाद इस व्यवस्था पर फिर सवाल उठने लगे हैं।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने नीट परीक्षा को समाप्त करने की मांग करते हुए कहा है कि मेडिकल एडमिशन 12वीं कक्षा के अंकों के आधार पर होना चाहिए। उनका तर्क है कि नीट लागू होने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों और सरकारी स्कूलों के छात्रों की मेडिकल सीटों तक पहुंच कम हुई है।
ग्रामीण छात्रों को नुकसान का दावा
मुख्यमंत्री विजय का कहना है कि खासकर क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई करने वाले और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले छात्रों को नीट व्यवस्था में अधिक कठिनाई झेलनी पड़ती है। उनका मानना है कि कोचिंग आधारित व्यवस्था ने गांव और छोटे शहरों के छात्रों को पीछे धकेल दिया है।
केवल बोर्ड नंबरों पर एडमिशन कितना सही?
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ 12वीं के अंकों के आधार पर मेडिकल एडमिशन देना कई समस्याएं पैदा कर सकता है। बोर्ड परीक्षा में कई छात्र रटकर अच्छे अंक हासिल कर लेते हैं, लेकिन डॉक्टर बनने के लिए केवल याददाश्त नहीं बल्कि गहरी समझ और विश्लेषण क्षमता भी जरूरी होती है।
मेडिकल योग्यता की सही जांच क्यों जरूरी?
नीट जैसी प्रवेश परीक्षा छात्रों की वास्तविक तैयारी और प्रतिस्पर्धा में प्रदर्शन का आकलन करती है। इससे यह पता चलता है कि छात्र कठिन परिस्थितियों में कितना बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। यदि केवल बोर्ड के अंक आधार बन जाएं तो यह मूल्यांकन कमजोर पड़ सकता है।
अच्छे छात्रों को भी हो सकता है नुकसान
कई बार पढ़ाई में अच्छे छात्र भी बोर्ड परीक्षा में अपेक्षा से कम अंक ला पाते हैं, जबकि कुछ छात्रों को अधिक नंबर मिल जाते हैं। ऐसे में केवल 12वीं के परिणाम के आधार पर एडमिशन होने से प्रतिभाशाली छात्र मेडिकल सीट से वंचित हो सकते हैं।
फर्जीवाड़े और दलालों का बढ़ सकता है खतरा
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि मेडिकल एडमिशन केवल बोर्ड अंकों पर आधारित हो जाए तो निजी कॉलेज और एजेंट छात्रों से भारी रकम वसूल सकते हैं। इससे फर्जी एडमिशन और अमान्य कॉलेजों में दाखिले जैसी समस्याएं बढ़ने का खतरा रहेगा।
देशभर में तेज हुई बहस
नीट को लेकर यह विवाद अब शिक्षा व्यवस्था और समान अवसर के मुद्दे से जुड़ गया है। एक पक्ष इसे पारदर्शी परीक्षा मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे ग्रामीण और गरीब छात्रों के लिए बाधा बता रहा है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी चर्चा देखने को मिल सकती है।



