By Malay Ojha | Published: 02 June 2026 | 03:47 PM
देशभर के लाखों छात्र इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले का सपना लेकर संयुक्त सीट आवंटन प्रक्रिया का इंतजार करते हैं। इस बार भी सीट आवंटन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन कई छात्रों के लिए यह खुशी के साथ चिंता लेकर आई है। वजह है बारहवीं में न्यूनतम अंकों से जुड़ा वह नियम, जो अच्छे प्रवेश परीक्षा अंक हासिल करने के बाद भी छात्रों का रास्ता रोक सकता है।
कई ऐसे छात्र हैं जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर की इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं में शानदार प्रदर्शन किया है। कुछ छात्रों ने उच्च रैंक भी हासिल की है, लेकिन बारहवीं के परिणाम आने के बाद उनकी चिंता बढ़ गई है। यदि निर्धारित प्रतिशत पूरा नहीं हुआ तो उन्हें देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों में दाखिला नहीं मिल पाएगा।
री-इवैल्यूएशन पर टिकी छात्रों की उम्मीद
ऐसे छात्रों की निगाह अब उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया पर टिकी हुई है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू कर दी है। कई छात्र उम्मीद कर रहे हैं कि कॉपियों की दोबारा जांच में अंक बढ़ सकते हैं और वे पात्रता की शर्त पूरी कर सकते हैं।
हालांकि कुछ अभ्यर्थियों का कहना है कि आवेदन पोर्टल पर तकनीकी दिक्कतें सामने आ रही हैं, जिससे समय पर आवेदन करने में परेशानी हो रही है।
आखिर क्या है 75 प्रतिशत वाला नियम?
देश के प्रमुख प्रौद्योगिकी संस्थानों में प्रवेश केवल प्रवेश परीक्षा के अंकों के आधार पर नहीं होता। इसके साथ बारहवीं परीक्षा में न्यूनतम 75 प्रतिशत अंक प्राप्त करना भी जरूरी है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के छात्रों के लिए यह सीमा 65 प्रतिशत निर्धारित है।
यानी यदि किसी छात्र ने प्रवेश परीक्षा में शानदार प्रदर्शन किया हो लेकिन बारहवीं में तय प्रतिशत हासिल न किया हो, तो उसका प्रवेश अटक सकता है।
कब लागू हुआ था यह नियम?
आज जिस नियम को लेकर छात्रों में चिंता दिखाई दे रही है, उसकी शुरुआत लगभग एक दशक पहले हुई थी। वर्ष 2017 में शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव किए गए थे। उस समय विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर बारहवीं के अंकों को प्रवेश रैंकिंग से अलग कर दिया गया।
इसके बाद प्रवेश परीक्षा के प्रदर्शन को प्राथमिक आधार बनाया गया, लेकिन साथ ही बारहवीं में न्यूनतम 75 प्रतिशत अंक की शर्त लागू कर दी गई।
पहले कैसे तय होती थी रैंकिंग?
वर्ष 2017 से पहले व्यवस्था अलग थी। उस समय प्रवेश परीक्षा और बारहवीं दोनों के अंकों को मिलाकर रैंकिंग तैयार की जाती थी। प्रवेश परीक्षा को अधिक महत्व दिया जाता था, जबकि बारहवीं के अंकों का भी बड़ा योगदान रहता था।
हालांकि उस दौर में भी कई संस्थानों में न्यूनतम अंक प्राप्त करना जरूरी माना जाता था।
इस साल क्यों बढ़ी है समस्या?
इस वर्ष बारहवीं के परिणामों में गिरावट देखने को मिली है। विशेष रूप से विज्ञान वर्ग के छात्रों के बीच अंक कम आने की शिकायतें अधिक हैं। भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान और गणित जैसे विषयों में अपेक्षा से कम अंक मिलने के कारण हजारों छात्र पात्रता सीमा के आसपास अटक गए हैं।
यही कारण है कि प्रवेश परीक्षा में सफल होने के बावजूद उनका दाखिला खतरे में दिखाई दे रहा है।
पहले भी मिल चुकी है राहत
ऐसा पहली बार नहीं है जब इस नियम को लेकर चर्चा हो रही है। महामारी के दौरान छात्रों को राहत देने के लिए सरकार ने दो वर्षों तक इस शर्त में छूट दी थी। उस समय विशेष परिस्थितियों को देखते हुए छात्रों को न्यूनतम प्रतिशत की बाध्यता से राहत प्रदान की गई थी।
इसी उदाहरण को आधार बनाकर अब कई छात्र और अभिभावक फिर से राहत की मांग कर रहे हैं।
ग्रेस मार्क्स की मांग ने पकड़ा जोर
परिणाम घोषित होने के बाद कई छात्र संगठनों और अभिभावकों ने अतिरिक्त अंक देने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि मूल्यांकन प्रक्रिया में कई तकनीकी खामियां रही हैं, जिसके कारण छात्रों को अपेक्षित अंक नहीं मिले।
कुछ लोगों का दावा है कि उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग और मूल्यांकन प्रक्रिया में कमियां रही हैं। हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल हजारों छात्रों की नजर पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया और संभावित सरकारी फैसलों पर टिकी हुई है। यदि अंकों में बढ़ोतरी होती है तो बड़ी संख्या में छात्रों को राहत मिल सकती है। दूसरी ओर यदि पात्रता की शर्त में कोई बदलाव नहीं होता, तो कई छात्रों का प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिले का सपना अधूरा रह सकता है।
आने वाले दिनों में यह मुद्दा शिक्षा जगत का सबसे चर्चित विषय बन सकता है, क्योंकि इसका सीधा असर लाखों छात्रों के भविष्य पर पड़ने वाला है।



