Sunday, July 26, 2026
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स्कूल की पढ़ाई हुई और महंगी, कॉलेज से ज्यादा तेजी से बढ़ी फीस; कोचिंग को लेकर आंकड़ों ने चौंकाया

By Malay Ojha | Published: 26 July 2026 | 11:24 AM

बच्चों की पढ़ाई का खर्च अब माता-पिता के घरेलू बजट पर पहले से ज्यादा असर डाल रहा है। ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि 2026 के शुरुआती छह महीनों में कॉलेज और विश्वविद्यालय की तुलना में स्कूल स्तर पर ट्यूशन फीस में ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। खासकर प्राथमिक और हायर सेकेंडरी कक्षाओं की फीस में पिछले आधार वर्ष की तुलना में 6 से 9 फीसदी तक का इजाफा दर्ज किया गया है। दूसरी ओर, उच्च शिक्षा की फीस इस अवधि में करीब 4 से 6 फीसदी बढ़ी। यानी बच्चों की स्कूली पढ़ाई का खर्च बढ़ने की रफ्तार अब उच्च शिक्षा से आगे निकलती दिख रही है।

आंकड़ों की सबसे बड़ी तस्वीर यही है कि शिक्षा पर होने वाला खर्च हर स्तर पर एक जैसा नहीं बढ़ रहा है। 2024 को आधार मानकर 2026 के पहले छह महीनों के आंकड़ों को देखें तो प्राथमिक और हायर सेकेंडरी स्तर की ट्यूशन फीस में करीब 6 से 9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। वहीं, उच्च शिक्षा यानी कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर फीस वृद्धि करीब 4 से 6 फीसदी के दायरे में रही। इससे साफ है कि जिन परिवारों के बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं, उनके लिए फीस का बढ़ता बोझ फिलहाल ज्यादा तेज है।

दो साल में स्कूल और कॉलेज के बीच बढ़ा अंतर
अगर 2024 के मुकाबले 2026 की स्थिति को देखा जाए तो स्कूल शिक्षा और उच्च शिक्षा की फीस में बढ़ोतरी का अंतर साफ दिखाई देता है। प्राथमिक और हायर सेकेंडरी स्तर पर फीस 6 से 9 फीसदी तक बढ़ी, जबकि उच्च शिक्षा में यह बढ़ोतरी 4 से 6 फीसदी रही। इसका सीधा मतलब है कि बीते दो वर्षों में स्कूल जाने वाले बच्चों के माता-पिता को फीस के मोर्चे पर अपेक्षाकृत ज्यादा दबाव झेलना पड़ा है।

2026 की पहली छमाही में भी फीस बढ़ने का सिलसिला जारी
2026 के पहले छह महीनों के दौरान शिक्षा सेवाओं से जुड़ी खुदरा महंगाई 4 फीसदी से कम रही। हालांकि, शिक्षा के अलग-अलग स्तरों पर स्थिति अलग रही। उच्च शिक्षा की ट्यूशन फीस में इस दौरान करीब 3.5 से 4 फीसदी तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह वृद्धि मिडिल स्कूल स्तर की फीस में हुई महंगाई के आसपास रही, जबकि प्राथमिक स्कूल की फीस में बढ़ोतरी इससे कम रही।

महंगाई का असर सिर्फ स्कूल फीस तक सीमित नहीं
बच्चों की पढ़ाई का कुल खर्च केवल स्कूल या कॉलेज की ट्यूशन फीस से तय नहीं होता। किताबें, कॉपियां, स्कूल ड्रेस, परिवहन, परीक्षा शुल्क और दूसरी शैक्षणिक जरूरतें भी परिवार के बजट का हिस्सा होती हैं। ऐसे में फीस में कुछ फीसदी की बढ़ोतरी भी सालाना खर्च में बड़ा अंतर पैदा कर सकती है, खासकर उन परिवारों के लिए जिनके एक से ज्यादा बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं।

इसी वजह से शिक्षा की लागत को लेकर सामने आने वाले महंगाई के आंकड़े अभिभावकों के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं। फीस में बढ़ोतरी भले ही प्रतिशत के लिहाज से सीमित दिखाई दे, लेकिन हर साल बढ़ने वाले कुल खर्च पर इसका असर जमा होता जाता है। निजी स्कूलों में फीस के अलावा परिवहन और दूसरी सुविधाओं का खर्च भी कई परिवारों के कुल शिक्षा बजट को प्रभावित करता है।

कोचिंग सेंटरों की फीस ने किया हैरान
आम तौर पर माना जाता है कि बच्चों की पढ़ाई का खर्च बढ़ने के पीछे स्कूल फीस के साथ-साथ कोचिंग और ट्यूशन का बड़ा हाथ है। लेकिन उपलब्ध आंकड़े इस धारणा की पूरी तरह पुष्टि नहीं करते। 2024 के आधार वर्ष की तुलना में 2026 की पहली छमाही तक कोचिंग और ट्यूशन सेंटरों की फीस में करीब 3 से 4 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यानी इस अवधि में इनकी फीस में हुई वृद्धि स्कूल स्तर की ट्यूशन फीस से कम रही।

इसका मतलब यह नहीं कि हर परिवार का खर्च कम बढ़ा
यहां एक बात समझना जरूरी है कि महंगाई के आंकड़े औसत स्थिति को दिखाते हैं। किसी खास स्कूल, शहर या कोचिंग संस्थान में फीस इससे ज्यादा या कम बढ़ सकती है। इसलिए आंकड़ों में 3 से 4 फीसदी की बढ़ोतरी का मतलब यह नहीं है कि हर अभिभावक का वास्तविक खर्च भी उतना ही बढ़ा है। परिवार की स्थिति, बच्चे की कक्षा, स्कूल का स्तर और पढ़ाई के लिए चुनी गई अतिरिक्त सुविधाओं के आधार पर कुल खर्च अलग हो सकता है।

इसी तरह, स्कूल फीस में 6 से 9 फीसदी की बढ़ोतरी का आंकड़ा भी सभी स्कूलों पर एक समान लागू नहीं होता। यह व्यापक स्तर पर फीस में बदलाव की तस्वीर पेश करता है। किसी स्कूल में फीस वृद्धि इससे कम हो सकती है, जबकि किसी दूसरे संस्थान में अभिभावकों को इससे ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है।

बच्चों की पढ़ाई अब परिवारों के बजट का बड़ा हिस्सा
शिक्षा पर बढ़ता खर्च ऐसे समय में सामने आया है जब परिवारों के सामने पहले से ही रोजमर्रा की जरूरतों को लेकर कई तरह के खर्च हैं। ऐसे में स्कूल फीस में लगातार होने वाली बढ़ोतरी का असर सीधे घरेलू बजट पर पड़ता है। खासकर मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए बच्चों की शिक्षा का खर्च एक ऐसा खर्च है, जिसमें कटौती करना आसान नहीं होता।

यही वजह है कि फीस में होने वाली छोटी बढ़ोतरी भी माता-पिता के लिए चिंता का कारण बनती है। स्कूल की फीस के साथ किताबें, ड्रेस, बस और दूसरी जरूरतों का खर्च जोड़ने पर सालाना शिक्षा बजट और बढ़ जाता है। यदि परिवार में दो या तीन बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हों तो यह दबाव और अधिक हो सकता है।

स्कूल शिक्षा पर बढ़ता खर्च क्यों महत्वपूर्ण है?
फीस बढ़ने की मौजूदा तस्वीर का सबसे अहम पहलू यह है कि स्कूल स्तर पर शिक्षा की लागत में बढ़ोतरी उच्च शिक्षा की तुलना में ज्यादा दिखाई दे रही है। इसका असर उन परिवारों पर पड़ता है जिनके बच्चे अभी स्कूल में हैं और आने वाले कई वर्षों तक उनकी शिक्षा का खर्च उठाना है।

वहीं, उच्च शिक्षा में फीस वृद्धि की रफ्तार तुलनात्मक रूप से कम रही है। 2026 की पहली छमाही में उच्च शिक्षा की ट्यूशन फीस में करीब 3.5 से 4 फीसदी की वृद्धि हुई, जबकि 2024 के आधार वर्ष से तुलना करने पर यह बढ़ोतरी करीब 4 से 6 फीसदी रही। इससे यह संकेत मिलता है कि शिक्षा महंगाई को केवल कॉलेज या विश्वविद्यालय की फीस से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं है।

अभिभावकों के लिए सबसे बड़ा संकेत
इन आंकड़ों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि बच्चों की पढ़ाई के खर्च को लेकर परिवारों को अब स्कूल स्तर पर ज्यादा सतर्क रहना होगा। फीस में बढ़ोतरी का असर एक साल में भले ही बहुत बड़ा न लगे, लेकिन लगातार बढ़ती लागत लंबे समय में परिवार के बजट पर बड़ा दबाव डाल सकती है।

वहीं, कोचिंग और ट्यूशन सेंटरों की फीस को लेकर सामने आया आंकड़ा कुछ राहत देने वाला जरूर है। आम धारणा के उलट 2024 के मुकाबले इन सेवाओं की फीस में करीब 3 से 4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जो स्कूल स्तर की ट्यूशन फीस में हुई वृद्धि से कम है। हालांकि, अलग-अलग शहरों और संस्थानों में वास्तविक फीस इससे काफी अलग हो सकती है।

पढ़ाई का खर्च बढ़ा, लेकिन तस्वीर सिर्फ फीस की नहीं
कुल मिलाकर 2026 की पहली छमाही के आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा सेवाओं की खुदरा महंगाई 4 फीसदी से नीचे रहने के बावजूद सभी स्तरों पर फीस बढ़ने की रफ्तार समान नहीं रही। पिछले दो वर्षों में प्राथमिक और हायर सेकेंडरी स्तर पर ट्यूशन फीस में 6 से 9 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई, जबकि उच्च शिक्षा में यह 4 से 6 फीसदी रही। कोचिंग और ट्यूशन सेंटरों की फीस में 3 से 4 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।

ऐसे में अभिभावकों के लिए सबसे अहम बात यह है कि बच्चों की शिक्षा का बजट बनाते समय केवल स्कूल की सालाना फीस को ध्यान में न रखा जाए। आने वाले वर्षों में किताबों, परिवहन और दूसरी शैक्षणिक जरूरतों पर होने वाले खर्च को भी जोड़कर योजना बनानी होगी। क्योंकि आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि **स्कूल स्तर की पढ़ाई का खर्च अब परिवारों की जेब पर पहले से ज्यादा दबाव डाल रहा है।

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स्कूल की पढ़ाई हुई और महंगी, कॉलेज से ज्यादा तेजी से बढ़ी फीस; कोचिंग को लेकर आंकड़ों ने चौंकाया

By Malay Ojha | Published: 26 July 2026 | 11:24 AM

बच्चों की पढ़ाई का खर्च अब माता-पिता के घरेलू बजट पर पहले से ज्यादा असर डाल रहा है। ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि 2026 के शुरुआती छह महीनों में कॉलेज और विश्वविद्यालय की तुलना में स्कूल स्तर पर ट्यूशन फीस में ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। खासकर प्राथमिक और हायर सेकेंडरी कक्षाओं की फीस में पिछले आधार वर्ष की तुलना में 6 से 9 फीसदी तक का इजाफा दर्ज किया गया है। दूसरी ओर, उच्च शिक्षा की फीस इस अवधि में करीब 4 से 6 फीसदी बढ़ी। यानी बच्चों की स्कूली पढ़ाई का खर्च बढ़ने की रफ्तार अब उच्च शिक्षा से आगे निकलती दिख रही है।

आंकड़ों की सबसे बड़ी तस्वीर यही है कि शिक्षा पर होने वाला खर्च हर स्तर पर एक जैसा नहीं बढ़ रहा है। 2024 को आधार मानकर 2026 के पहले छह महीनों के आंकड़ों को देखें तो प्राथमिक और हायर सेकेंडरी स्तर की ट्यूशन फीस में करीब 6 से 9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। वहीं, उच्च शिक्षा यानी कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर फीस वृद्धि करीब 4 से 6 फीसदी के दायरे में रही। इससे साफ है कि जिन परिवारों के बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं, उनके लिए फीस का बढ़ता बोझ फिलहाल ज्यादा तेज है।

दो साल में स्कूल और कॉलेज के बीच बढ़ा अंतर
अगर 2024 के मुकाबले 2026 की स्थिति को देखा जाए तो स्कूल शिक्षा और उच्च शिक्षा की फीस में बढ़ोतरी का अंतर साफ दिखाई देता है। प्राथमिक और हायर सेकेंडरी स्तर पर फीस 6 से 9 फीसदी तक बढ़ी, जबकि उच्च शिक्षा में यह बढ़ोतरी 4 से 6 फीसदी रही। इसका सीधा मतलब है कि बीते दो वर्षों में स्कूल जाने वाले बच्चों के माता-पिता को फीस के मोर्चे पर अपेक्षाकृत ज्यादा दबाव झेलना पड़ा है।

2026 की पहली छमाही में भी फीस बढ़ने का सिलसिला जारी
2026 के पहले छह महीनों के दौरान शिक्षा सेवाओं से जुड़ी खुदरा महंगाई 4 फीसदी से कम रही। हालांकि, शिक्षा के अलग-अलग स्तरों पर स्थिति अलग रही। उच्च शिक्षा की ट्यूशन फीस में इस दौरान करीब 3.5 से 4 फीसदी तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह वृद्धि मिडिल स्कूल स्तर की फीस में हुई महंगाई के आसपास रही, जबकि प्राथमिक स्कूल की फीस में बढ़ोतरी इससे कम रही।

महंगाई का असर सिर्फ स्कूल फीस तक सीमित नहीं
बच्चों की पढ़ाई का कुल खर्च केवल स्कूल या कॉलेज की ट्यूशन फीस से तय नहीं होता। किताबें, कॉपियां, स्कूल ड्रेस, परिवहन, परीक्षा शुल्क और दूसरी शैक्षणिक जरूरतें भी परिवार के बजट का हिस्सा होती हैं। ऐसे में फीस में कुछ फीसदी की बढ़ोतरी भी सालाना खर्च में बड़ा अंतर पैदा कर सकती है, खासकर उन परिवारों के लिए जिनके एक से ज्यादा बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं।

इसी वजह से शिक्षा की लागत को लेकर सामने आने वाले महंगाई के आंकड़े अभिभावकों के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं। फीस में बढ़ोतरी भले ही प्रतिशत के लिहाज से सीमित दिखाई दे, लेकिन हर साल बढ़ने वाले कुल खर्च पर इसका असर जमा होता जाता है। निजी स्कूलों में फीस के अलावा परिवहन और दूसरी सुविधाओं का खर्च भी कई परिवारों के कुल शिक्षा बजट को प्रभावित करता है।

कोचिंग सेंटरों की फीस ने किया हैरान
आम तौर पर माना जाता है कि बच्चों की पढ़ाई का खर्च बढ़ने के पीछे स्कूल फीस के साथ-साथ कोचिंग और ट्यूशन का बड़ा हाथ है। लेकिन उपलब्ध आंकड़े इस धारणा की पूरी तरह पुष्टि नहीं करते। 2024 के आधार वर्ष की तुलना में 2026 की पहली छमाही तक कोचिंग और ट्यूशन सेंटरों की फीस में करीब 3 से 4 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यानी इस अवधि में इनकी फीस में हुई वृद्धि स्कूल स्तर की ट्यूशन फीस से कम रही।

इसका मतलब यह नहीं कि हर परिवार का खर्च कम बढ़ा
यहां एक बात समझना जरूरी है कि महंगाई के आंकड़े औसत स्थिति को दिखाते हैं। किसी खास स्कूल, शहर या कोचिंग संस्थान में फीस इससे ज्यादा या कम बढ़ सकती है। इसलिए आंकड़ों में 3 से 4 फीसदी की बढ़ोतरी का मतलब यह नहीं है कि हर अभिभावक का वास्तविक खर्च भी उतना ही बढ़ा है। परिवार की स्थिति, बच्चे की कक्षा, स्कूल का स्तर और पढ़ाई के लिए चुनी गई अतिरिक्त सुविधाओं के आधार पर कुल खर्च अलग हो सकता है।

इसी तरह, स्कूल फीस में 6 से 9 फीसदी की बढ़ोतरी का आंकड़ा भी सभी स्कूलों पर एक समान लागू नहीं होता। यह व्यापक स्तर पर फीस में बदलाव की तस्वीर पेश करता है। किसी स्कूल में फीस वृद्धि इससे कम हो सकती है, जबकि किसी दूसरे संस्थान में अभिभावकों को इससे ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है।

बच्चों की पढ़ाई अब परिवारों के बजट का बड़ा हिस्सा
शिक्षा पर बढ़ता खर्च ऐसे समय में सामने आया है जब परिवारों के सामने पहले से ही रोजमर्रा की जरूरतों को लेकर कई तरह के खर्च हैं। ऐसे में स्कूल फीस में लगातार होने वाली बढ़ोतरी का असर सीधे घरेलू बजट पर पड़ता है। खासकर मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए बच्चों की शिक्षा का खर्च एक ऐसा खर्च है, जिसमें कटौती करना आसान नहीं होता।

यही वजह है कि फीस में होने वाली छोटी बढ़ोतरी भी माता-पिता के लिए चिंता का कारण बनती है। स्कूल की फीस के साथ किताबें, ड्रेस, बस और दूसरी जरूरतों का खर्च जोड़ने पर सालाना शिक्षा बजट और बढ़ जाता है। यदि परिवार में दो या तीन बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हों तो यह दबाव और अधिक हो सकता है।

स्कूल शिक्षा पर बढ़ता खर्च क्यों महत्वपूर्ण है?
फीस बढ़ने की मौजूदा तस्वीर का सबसे अहम पहलू यह है कि स्कूल स्तर पर शिक्षा की लागत में बढ़ोतरी उच्च शिक्षा की तुलना में ज्यादा दिखाई दे रही है। इसका असर उन परिवारों पर पड़ता है जिनके बच्चे अभी स्कूल में हैं और आने वाले कई वर्षों तक उनकी शिक्षा का खर्च उठाना है।

वहीं, उच्च शिक्षा में फीस वृद्धि की रफ्तार तुलनात्मक रूप से कम रही है। 2026 की पहली छमाही में उच्च शिक्षा की ट्यूशन फीस में करीब 3.5 से 4 फीसदी की वृद्धि हुई, जबकि 2024 के आधार वर्ष से तुलना करने पर यह बढ़ोतरी करीब 4 से 6 फीसदी रही। इससे यह संकेत मिलता है कि शिक्षा महंगाई को केवल कॉलेज या विश्वविद्यालय की फीस से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं है।

अभिभावकों के लिए सबसे बड़ा संकेत
इन आंकड़ों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि बच्चों की पढ़ाई के खर्च को लेकर परिवारों को अब स्कूल स्तर पर ज्यादा सतर्क रहना होगा। फीस में बढ़ोतरी का असर एक साल में भले ही बहुत बड़ा न लगे, लेकिन लगातार बढ़ती लागत लंबे समय में परिवार के बजट पर बड़ा दबाव डाल सकती है।

वहीं, कोचिंग और ट्यूशन सेंटरों की फीस को लेकर सामने आया आंकड़ा कुछ राहत देने वाला जरूर है। आम धारणा के उलट 2024 के मुकाबले इन सेवाओं की फीस में करीब 3 से 4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जो स्कूल स्तर की ट्यूशन फीस में हुई वृद्धि से कम है। हालांकि, अलग-अलग शहरों और संस्थानों में वास्तविक फीस इससे काफी अलग हो सकती है।

पढ़ाई का खर्च बढ़ा, लेकिन तस्वीर सिर्फ फीस की नहीं
कुल मिलाकर 2026 की पहली छमाही के आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा सेवाओं की खुदरा महंगाई 4 फीसदी से नीचे रहने के बावजूद सभी स्तरों पर फीस बढ़ने की रफ्तार समान नहीं रही। पिछले दो वर्षों में प्राथमिक और हायर सेकेंडरी स्तर पर ट्यूशन फीस में 6 से 9 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई, जबकि उच्च शिक्षा में यह 4 से 6 फीसदी रही। कोचिंग और ट्यूशन सेंटरों की फीस में 3 से 4 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।

ऐसे में अभिभावकों के लिए सबसे अहम बात यह है कि बच्चों की शिक्षा का बजट बनाते समय केवल स्कूल की सालाना फीस को ध्यान में न रखा जाए। आने वाले वर्षों में किताबों, परिवहन और दूसरी शैक्षणिक जरूरतों पर होने वाले खर्च को भी जोड़कर योजना बनानी होगी। क्योंकि आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि **स्कूल स्तर की पढ़ाई का खर्च अब परिवारों की जेब पर पहले से ज्यादा दबाव डाल रहा है।

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