Friday, November 6, 2026
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12वीं तक आते-आते स्कूल से क्यों होने लगता है मोहभंग? सर्वे में सामने आई छात्रों की चिंता बढ़ाने वाली तस्वीर

By Malay Ojha | Published: 29 October 2026 | 11:48 AM

स्कूल में पढ़ाई के साथ दोस्तों से मिलना, खेलना और नई चीजें सीखना बच्चों को खूब पसंद आता है। लेकिन जैसे-जैसे वे बड़ी कक्षाओं में पहुंचते हैं, स्कूल को लेकर उनका नजरिया बदलने लगता है। 12वीं तक आते-आते कई छात्र स्कूल लाइफ से असंतुष्ट हो जाते हैं। उनका आत्मविश्वास घटने लगता है और चिंता व भावनात्मक तनाव बढ़ने लगता है। देशभर में हुए एक सर्वे में छात्रों की स्कूल लाइफ और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर यह अहम खुलासा हुआ है।

12वीं के 59% छात्र स्कूल लाइफ से असंतुष्ट
काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन (CISCE) और IC3 इंस्टीट्यूट की संयुक्त रिपोर्ट स्टूडेंट वेल-बीइंग पल्स रिपोर्ट 2025-26 में यह बात सामने आई है। देशभर के 8,515 छात्रों पर किए गए सर्वे के मुताबिक, 12वीं कक्षा के 59 फीसदी छात्र अपनी स्कूल लाइफ से संतुष्ट नहीं हैं। वहीं, सिर्फ 19 फीसदी छात्रों ने स्कूल लाइफ को लेकर उच्च स्तर की संतुष्टि जाहिर की।

आठवीं के छात्रों का नजरिया 12वीं से बिल्कुल अलग
रिपोर्ट में आठवीं और 12वीं के छात्रों के बीच स्कूल लाइफ को लेकर बड़ा अंतर दिखाई दिया। आठवीं कक्षा के 57 फीसदी छात्रों ने स्कूल लाइफ से संतुष्ट होने की बात कही, जबकि केवल 23 फीसदी छात्रों ने कम संतुष्टि जाहिर की। आंकड़े बताते हैं कि छोटी कक्षाओं से बड़ी कक्षाओं तक पहुंचने के दौरान छात्रों के स्कूल से जुड़ाव में गिरावट देखने को मिलती है।

बड़ी कक्षाओं में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता
स्कूल लाइफ के साथ छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी रिपोर्ट में अहम आंकड़े सामने आए हैं। आठवीं कक्षा में 62 फीसदी छात्रों ने अपने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर संतुष्टि जताई। 12वीं में यह आंकड़ा घटकर 43 फीसदी रह गया। यानी बोर्ड परीक्षा की कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर संतुष्टि में भी गिरावट दर्ज की गई।

खुश रहने वाले छात्रों की संख्या घटी, आत्मविश्वास भी कमजोर
रिपोर्ट के मुताबिक, आठवीं कक्षा में 65 फीसदी छात्र अक्सर या हमेशा खुश रहते हैं, जबकि 12वीं में ऐसे छात्रों का अनुपात घटकर 48 फीसदी रह गया। इसी तरह, आठवीं में 64 फीसदी छात्रों ने आत्मविश्वास महसूस करने की बात कही, लेकिन 12वीं में यह आंकड़ा गिरकर 47 फीसदी पर पहुंच गया।

12वीं में चिंता और कम ऊर्जा महसूस करने वाले छात्र बढ़े
सर्वे में छात्रों की नकारात्मक भावनाओं को लेकर भी चिंता सामने आई है। आठवीं कक्षा में 22 फीसदी छात्र अक्सर या हमेशा चिंता महसूस करते हैं, जबकि 12वीं में यह अनुपात बढ़कर 37 फीसदी हो गया। इसी तरह, अक्सर कम ऊर्जा महसूस करने वाले छात्रों का प्रतिशत आठवीं में 27 फीसदी था, जो 12वीं में बढ़कर 44 फीसदी हो गया।

हालांकि, निजी जिंदगी को लेकर तस्वीर कुछ अलग है। सर्वे में शामिल 63 फीसदी छात्रों ने बताया कि वे अपनी निजी जिंदगी से काफी संतुष्ट हैं। इसमें दोस्तों और परिवार के साथ उनके रिश्ते भी शामिल हैं।

सिर्फ परीक्षा के नंबर से नहीं समझ सकते छात्रों का तनाव
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि परीक्षा के नंबर, मॉक टेस्ट और बोर्ड के नतीजे किसी छात्र की पूरी मानसिक स्थिति नहीं बताते। अच्छे अंक हासिल करने वाला छात्र भी भावनात्मक दबाव से गुजर सकता है। ऐसे में स्कूलों में छात्रों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूलों में ऐसी व्यवस्थाएं होनी चाहिए, जहां छात्र बिना झिझक अपनी परेशानियां साझा कर सकें और जरूरत पड़ने पर उन्हें आसानी से मदद मिल सके। पढ़ाई के साथ छात्रों की भावनात्मक जरूरतों को समझना भी स्कूलों की अहम जिम्मेदारी है।

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12वीं तक आते-आते स्कूल से क्यों होने लगता है मोहभंग? सर्वे में सामने आई छात्रों की चिंता बढ़ाने वाली तस्वीर

By Malay Ojha | Published: 29 October 2026 | 11:48 AM

स्कूल में पढ़ाई के साथ दोस्तों से मिलना, खेलना और नई चीजें सीखना बच्चों को खूब पसंद आता है। लेकिन जैसे-जैसे वे बड़ी कक्षाओं में पहुंचते हैं, स्कूल को लेकर उनका नजरिया बदलने लगता है। 12वीं तक आते-आते कई छात्र स्कूल लाइफ से असंतुष्ट हो जाते हैं। उनका आत्मविश्वास घटने लगता है और चिंता व भावनात्मक तनाव बढ़ने लगता है। देशभर में हुए एक सर्वे में छात्रों की स्कूल लाइफ और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर यह अहम खुलासा हुआ है।

12वीं के 59% छात्र स्कूल लाइफ से असंतुष्ट
काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन (CISCE) और IC3 इंस्टीट्यूट की संयुक्त रिपोर्ट स्टूडेंट वेल-बीइंग पल्स रिपोर्ट 2025-26 में यह बात सामने आई है। देशभर के 8,515 छात्रों पर किए गए सर्वे के मुताबिक, 12वीं कक्षा के 59 फीसदी छात्र अपनी स्कूल लाइफ से संतुष्ट नहीं हैं। वहीं, सिर्फ 19 फीसदी छात्रों ने स्कूल लाइफ को लेकर उच्च स्तर की संतुष्टि जाहिर की।

आठवीं के छात्रों का नजरिया 12वीं से बिल्कुल अलग
रिपोर्ट में आठवीं और 12वीं के छात्रों के बीच स्कूल लाइफ को लेकर बड़ा अंतर दिखाई दिया। आठवीं कक्षा के 57 फीसदी छात्रों ने स्कूल लाइफ से संतुष्ट होने की बात कही, जबकि केवल 23 फीसदी छात्रों ने कम संतुष्टि जाहिर की। आंकड़े बताते हैं कि छोटी कक्षाओं से बड़ी कक्षाओं तक पहुंचने के दौरान छात्रों के स्कूल से जुड़ाव में गिरावट देखने को मिलती है।

बड़ी कक्षाओं में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता
स्कूल लाइफ के साथ छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी रिपोर्ट में अहम आंकड़े सामने आए हैं। आठवीं कक्षा में 62 फीसदी छात्रों ने अपने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर संतुष्टि जताई। 12वीं में यह आंकड़ा घटकर 43 फीसदी रह गया। यानी बोर्ड परीक्षा की कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर संतुष्टि में भी गिरावट दर्ज की गई।

खुश रहने वाले छात्रों की संख्या घटी, आत्मविश्वास भी कमजोर
रिपोर्ट के मुताबिक, आठवीं कक्षा में 65 फीसदी छात्र अक्सर या हमेशा खुश रहते हैं, जबकि 12वीं में ऐसे छात्रों का अनुपात घटकर 48 फीसदी रह गया। इसी तरह, आठवीं में 64 फीसदी छात्रों ने आत्मविश्वास महसूस करने की बात कही, लेकिन 12वीं में यह आंकड़ा गिरकर 47 फीसदी पर पहुंच गया।

12वीं में चिंता और कम ऊर्जा महसूस करने वाले छात्र बढ़े
सर्वे में छात्रों की नकारात्मक भावनाओं को लेकर भी चिंता सामने आई है। आठवीं कक्षा में 22 फीसदी छात्र अक्सर या हमेशा चिंता महसूस करते हैं, जबकि 12वीं में यह अनुपात बढ़कर 37 फीसदी हो गया। इसी तरह, अक्सर कम ऊर्जा महसूस करने वाले छात्रों का प्रतिशत आठवीं में 27 फीसदी था, जो 12वीं में बढ़कर 44 फीसदी हो गया।

हालांकि, निजी जिंदगी को लेकर तस्वीर कुछ अलग है। सर्वे में शामिल 63 फीसदी छात्रों ने बताया कि वे अपनी निजी जिंदगी से काफी संतुष्ट हैं। इसमें दोस्तों और परिवार के साथ उनके रिश्ते भी शामिल हैं।

सिर्फ परीक्षा के नंबर से नहीं समझ सकते छात्रों का तनाव
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि परीक्षा के नंबर, मॉक टेस्ट और बोर्ड के नतीजे किसी छात्र की पूरी मानसिक स्थिति नहीं बताते। अच्छे अंक हासिल करने वाला छात्र भी भावनात्मक दबाव से गुजर सकता है। ऐसे में स्कूलों में छात्रों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूलों में ऐसी व्यवस्थाएं होनी चाहिए, जहां छात्र बिना झिझक अपनी परेशानियां साझा कर सकें और जरूरत पड़ने पर उन्हें आसानी से मदद मिल सके। पढ़ाई के साथ छात्रों की भावनात्मक जरूरतों को समझना भी स्कूलों की अहम जिम्मेदारी है।

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