By Malay Ojha | Published: 05 November 2026 | 07:03 PM
बिहार के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का तरीका बदलने जा रहा है। अब पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी के साथ अपनी क्षेत्रीय भाषा पढ़ने का मौका मिलेगा। बिहार सरकार ने इसके लिए मैथिली, भोजपुरी, बज्जिका, मगही, सुरजापुरी और अंगिका को शामिल किया है। नई व्यवस्था अगले शैक्षणिक सत्र से लागू करने की तैयारी है। खास बात यह है कि बच्चों को उनकी स्थानीयता के आधार पर क्षेत्रीय भाषा पढ़ाई जाएगी।
पहली और दूसरी कक्षा से होगी शुरुआत
बिहार सरकार की इस योजना के तहत फिलहाल कक्षा एक और दो के बच्चों को क्षेत्रीय भाषाएं पढ़ाई जाएंगी। इन भाषाओं को पाठ्यक्रम में एक विषय के रूप में शामिल किया जाएगा। यानी जिस इलाके में जिस भाषा का ज्यादा इस्तेमाल होता है, वहां के बच्चों को उसी भाषा में पढ़ने का अवसर मिलेगा।
बाद में कक्षा 3 से 5 तक भी पहुंचेगी योजना
राज्य के शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी के मुताबिक, शुरुआत में इस व्यवस्था को पहली और दूसरी कक्षा में लागू किया जाएगा। इसके बाद धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ाकर कक्षा तीन से पांच तक भी किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे बच्चे अपनी मातृभाषा में आसानी से पढ़ाई समझ सकेंगे और शुरुआती शिक्षा में उनकी भागीदारी भी बेहतर होगी।
SCERT तैयार कर रहा छह क्षेत्रीय भाषाओं की किताबें
इस योजना को जमीन पर उतारने के लिए राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) ने किताबें तैयार करने का काम शुरू कर दिया है। SCERT निदेशक यतेंद्र कुमार पाल के अनुसार, पुस्तकों को तैयार करने में शिक्षकों और भाषा विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है।
इन किताबों को आने वाले शैक्षणिक सत्र से लागू करने की तैयारी है। फिलहाल पहली और दूसरी कक्षा के लिए पाठ्य सामग्री तैयार की जा रही है। इसके बाद तीसरी से पांचवीं कक्षा के लिए भी क्षेत्रीय भाषाओं की किताबें बनाई जाएंगी।
नई शिक्षा नीति 2020 के तहत लिया गया फैसला
बिहार सरकार का यह कदम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के प्रावधानों के अनुरूप है। नीति में शुरुआती कक्षाओं में बच्चों को उनकी मातृभाषा या स्थानीय भाषा में शिक्षा देने पर जोर दिया गया है।
इसी दिशा में तैयार की जा रही किताबों की रूपरेखा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) 2023 के अनुरूप रखी गई है। सरकार का उद्देश्य है कि बच्चे जिस भाषा को घर और अपने आसपास के माहौल में बोलते और समझते हैं, उसी भाषा के जरिए शुरुआती शिक्षा को और आसान बनाया जा सके।
बिहार के बच्चों को क्या होगा फायदा?
बिहार में अलग-अलग क्षेत्रों में मैथिली, भोजपुरी, बज्जिका, मगही, सुरजापुरी और अंगिका बोलने वालों की बड़ी आबादी है। ऐसे में क्षेत्रीय भाषाओं को स्कूलों में जगह मिलने से बच्चों को अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़कर पढ़ने का अवसर मिलेगा।
साथ ही, शुरुआती कक्षाओं में भाषा की परेशानी कम होने और पढ़ाई को बेहतर तरीके से समझने में भी मदद मिलने की उम्मीद है। अब देखना होगा कि अगले शैक्षणिक सत्र में यह व्यवस्था कितने प्रभावी तरीके से सरकारी स्कूलों में लागू हो पाती है।



