By Malay Ojha | Published: 30 July 2026 | 08:41 PM
इनकम टैक्स रिटर्न भरने की आखिरी तारीख को लेकर हर साल लाखों करदाताओं के मन में सवाल रहता है कि आखिर इसकी समय सीमा तय करने और जरूरत पड़ने पर बढ़ाने का अधिकार किसके पास होता है। आम तौर पर लोग मान लेते हैं कि प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री ही रिटर्न की तारीख बढ़ाने का फैसला करते हैं। लेकिन असल तस्वीर इससे अलग है। आयकर रिटर्न की समय सीमा में बदलाव का औपचारिक फैसला केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड यानी सीबीडीटी करता है।
सीबीडीटी सीधे तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय या वित्त मंत्री के स्तर पर काम करने वाली संस्था नहीं है। यह वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अधीन काम करने वाला आयकर प्रशासन का प्रमुख बोर्ड है। जब आयकर रिटर्न की नियत तारीख में बदलाव किया जाता है, तो इसकी औपचारिक घोषणा भी इसी बोर्ड की ओर से आदेश या परिपत्र के जरिए की जाती है।
आकलन वर्ष 2026-27 के लिए आयकर विभाग की आधिकारिक जानकारी में आईटीआर-4 भरने की नियत तारीख 31 अगस्त 2026 बताई गई है। ऐसे में इस साल की समय सीमा को लेकर यह समझना जरूरी है कि हर स्थिति में 31 जुलाई से 31 अगस्त तक की तारीख बढ़ाई गई हो, ऐसा मानना सही नहीं है। अलग-अलग श्रेणी के करदाताओं और अलग-अलग आयकर रिटर्न फॉर्म के लिए नियत तारीख अलग हो सकती है।
प्रधानमंत्री की क्या भूमिका होती है?
प्रधानमंत्री सीधे तौर पर किसी करदाता के आयकर रिटर्न की आखिरी तारीख बढ़ाने का आदेश जारी नहीं करते। प्रधानमंत्री देश की आर्थिक नीतियों और सरकार की व्यापक कर नीति में अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन किसी खास समय पर रिटर्न दाखिल करने की अंतिम तारीख में बदलाव करना एक प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया है।
इसी वजह से ऐसी स्थिति में अंतिम औपचारिक आदेश सीबीडीटी की ओर से जारी होता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार के शीर्ष स्तर की भूमिका बिल्कुल नहीं होती। कर व्यवस्था से जुड़े बड़े फैसले सरकार की व्यापक नीति और वित्त मंत्रालय के प्रशासनिक ढांचे के भीतर लिए जाते हैं, लेकिन किसी विशेष समय सीमा में बदलाव का अधिकार संबंधित कानून और प्रशासनिक व्यवस्था के तहत सीबीडीटी के पास रहता है।
वित्त मंत्री खुद तारीख क्यों नहीं बढ़ाते?
वित्त मंत्री वित्त मंत्रालय के राजनीतिक प्रमुख होते हैं और देश की कर नीति से जुड़े बड़े फैसलों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। बजट में कर दरों, छूट और नियमों में बदलाव जैसे बड़े फैसले सरकार और संसद की प्रक्रिया से जुड़े होते हैं।
लेकिन किसी वित्तीय वर्ष में आयकर रिटर्न दाखिल करने की समय सीमा को परिस्थितियों के आधार पर बदलना अलग तरह का प्रशासनिक फैसला है। ऐसे मामलों में संबंधित विभाग स्थिति की समीक्षा करता है और कानून के तहत उपलब्ध अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए जरूरी आदेश जारी करता है। यही वजह है कि जब रिटर्न की तारीख में बदलाव होता है तो आधिकारिक घोषणा सीबीडीटी के आदेश या परिपत्र के माध्यम से सामने आती है।
सीबीडीटी कब बढ़ा सकता है ITR की डेडलाइन?
आयकर रिटर्न की समय सीमा हर साल अपने आप नहीं बढ़ाई जाती। आम तौर पर इसके पीछे कोई ठोस वजह या व्यावहारिक समस्या होती है। अगर करदाताओं को रिटर्न दाखिल करने में बड़े स्तर पर परेशानी आ रही हो या कर अनुपालन की प्रक्रिया में ऐसी दिक्कत सामने आए जिससे समय पर रिटर्न भरना मुश्किल हो जाए, तब समय सीमा में बदलाव पर विचार किया जा सकता है।
ऐसी परिस्थितियों में आयकर विभाग के ऑनलाइन रिटर्न दाखिल करने वाले मंच पर तकनीकी परेशानी, अंतिम दिनों में अचानक बढ़ा हुआ भार, रिटर्न फॉर्म में महत्वपूर्ण बदलाव या किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियां शामिल हो सकती हैं। हालांकि, हर तकनीकी दिक्कत का मतलब यह नहीं है कि समय सीमा जरूर बढ़ाई जाएगी। इसका फैसला संबंधित परिस्थितियों की गंभीरता और प्रशासनिक जरूरत को देखते हुए किया जाता है।
क्या कर विशेषज्ञों की मांग पर भी होता है विचार?
समय सीमा बढ़ाने की मांग कई बार कर सलाहकारों, चार्टर्ड अकाउंटेंट और उनसे जुड़े पेशेवर संगठनों की ओर से भी उठाई जाती है। इन संगठनों की ओर से आम तौर पर यह बताया जाता है कि करदाताओं को रिटर्न दाखिल करने में किस तरह की व्यावहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
मसलन, अगर रिटर्न फॉर्म में बड़ा बदलाव हुआ हो, जरूरी जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं हो रही हो या ऑनलाइन दाखिल करने की प्रक्रिया में व्यापक तकनीकी समस्या बनी हुई हो, तो पेशेवर संगठन सरकार और सीबीडीटी के सामने अपनी मांग रख सकते हैं। हालांकि, इन मांगों के आधार पर समय सीमा बढ़ाना अनिवार्य नहीं होता। अंतिम फैसला संबंधित प्राधिकरण परिस्थितियों की समीक्षा के बाद करता है।
धारा 119 में क्या है प्रावधान?
आयकर रिटर्न की समय सीमा और करदाताओं को राहत देने के मामले में आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 119 महत्वपूर्ण है। इस धारा के तहत बोर्ड को आयकर कानून के बेहतर प्रशासन के लिए आदेश, निर्देश और दिशानिर्देश जारी करने का अधिकार दिया गया है।
कानून में यह भी प्रावधान है कि वास्तविक कठिनाई की स्थिति में राहत देने के लिए बोर्ड कुछ खास वर्गों या मामलों के संबंध में जरूरी निर्देश जारी कर सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कानून का पालन करते समय करदाताओं को होने वाली वास्तविक और उचित कठिनाइयों का समाधान किया जा सके।
क्या हर करदाता की ITR तारीख एक जैसी होती है?
यह समझना भी जरूरी है कि सभी करदाताओं के लिए आयकर रिटर्न दाखिल करने की आखिरी तारीख हमेशा एक जैसी नहीं होती। रिटर्न का फॉर्म, आय का स्रोत, कारोबार या पेशे की प्रकृति और कर ऑडिट की जरूरत जैसे आधार पर नियत तारीख अलग हो सकती है।
इसी वजह से किसी एक तारीख को सभी करदाताओं पर लागू मान लेना सही नहीं है। उदाहरण के तौर पर, आयकर विभाग की आधिकारिक जानकारी में आकलन वर्ष 2026-27 के लिए आईटीआर-4 की नियत तारीख 31 अगस्त 2026 दी गई है। इसलिए करदाताओं को अपनी आय और रिटर्न की श्रेणी के हिसाब से लागू तारीख की जांच करनी चाहिए।
तो आखिर अंतिम फैसला कौन करता है?
सीधे शब्दों में समझें तो आयकर रिटर्न की समय सीमा में बदलाव की औपचारिक घोषणा सीबीडीटी करता है। यह बोर्ड वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के तहत काम करता है। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री की भूमिका सरकार की व्यापक आर्थिक और कर नीति के स्तर पर महत्वपूर्ण होती है, लेकिन किसी खास समय पर आईटीआर की नियत तारीख में बदलाव का औपचारिक आदेश सीबीडीटी के अधिकार क्षेत्र में आता है।
इसलिए अगली बार जब आयकर रिटर्न की समय सीमा बढ़ने की खबर सामने आए, तो यह समझना आसान होगा कि इसका आधिकारिक फैसला किसी एक राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि संबंधित कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत लिया जाता है। सीबीडीटी परिस्थितियों का आकलन करने के बाद कानून में मिले अधिकारों के आधार पर आदेश जारी करता है। यही आदेश करदाताओं के लिए नई समय सीमा को आधिकारिक बनाता है।
करदाताओं के लिए जरूरी बात
समय सीमा बढ़ने की उम्मीद में रिटर्न दाखिल करने में देरी करना हमेशा सही रणनीति नहीं है। करदाताओं को अपने लिए लागू नियत तारीख और रिटर्न फॉर्म की जानकारी आधिकारिक आयकर विभाग के मंच से जांचनी चाहिए। अगर किसी कारण से समय सीमा में बदलाव किया जाता है, तो उसकी जानकारी भी आधिकारिक आदेश या परिपत्र के जरिए सामने आती है।
इसलिए सवाल का सीधा जवाब यही है—आईटीआर की समय सीमा बढ़ाने का औपचारिक फैसला सीबीडीटी करता है। प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री सीधे तौर पर हर बार रिटर्न की डेडलाइन बढ़ाने का आदेश जारी नहीं करते। इस प्रक्रिया में वित्त मंत्रालय का राजस्व विभाग और आयकर प्रशासन की भूमिका होती है, जबकि अंतिम आधिकारिक आदेश सीबीडीटी की ओर से जारी किया जाता है।



