By Malay Ojha | Published: 15 September 2026 | 06:46 PM
काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के महामना सभागार में हिंदी दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में अभिनेता संजय मिश्रा ने विद्यार्थियों से अपने अभिनय सफर, बनारस से जुड़ी यादों और संघर्ष के अनुभव साझा किए। हिंदी प्रकाशन समिति की ओर से आयोजित कार्यक्रम में संजय मिश्रा के मंच पर पहुंचते ही सभागार तालियों से गूंज उठा। इसी दौरान ‘अचिंत्य 6.0’ पत्रिका के विशेष अंक ‘क्षितिज के परे’ का विमोचन भी किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों के स्वागत और हिंदी के महत्व पर संक्षिप्त संबोधन के साथ हुई। विज्ञान संस्थान के डीन-डायरेक्टर ने मुख्य अतिथि संजय मिश्रा को पुष्पगुच्छ और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन दीपांशी अग्रवाल ने किया। संजय मिश्रा के मंच पर आते ही विद्यार्थियों और साहित्य प्रेमियों ने तालियों से उनका स्वागत किया।
‘बनारस एक खूबसूरत सोच है’
विद्यार्थियों से बातचीत के दौरान संजय मिश्रा ने बनारस से अपने लगाव को बेहद सहज अंदाज में बताया। उन्होंने कहा, “बनारस एक खूबसूरत सोच है। ये सिखाता है कि जो आप हैं, वही रहिए।” उन्होंने बनारस की गलियों में गमछा पहनकर घूमने की अपनी याद भी साझा की। उनके इस अंदाज से कार्यक्रम में मौजूद छात्रों के बीच खास उत्साह नजर आया।
समोसे की वजह से स्कूल में देर हुई तो लिख डाला आवेदन
संजय मिश्रा ने बातचीत के दौरान अपनी स्कूली जिंदगी का एक मजेदार किस्सा भी सुनाया। उन्होंने बताया कि एक बार रास्ते में समोसा खाने की वजह से वह स्कूल करीब आधे घंटे देर से पहुंचे। शिक्षक ने वजह पूछी तो उन्होंने कह दिया कि मां बीमार हैं। इसके बाद शिक्षक ने आवेदन लिखने को कहा। संजय मिश्रा ने मजाकिया अंदाज में बताया कि उन्होंने आवेदन के नाम पर करीब 18 पेज लिख डाले, लेकिन वह भी ठीक से नहीं लिख पाए।
‘मैं इतिहास पढ़ना नहीं, देखना चाहता था’
विद्यार्थियों के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने अपने अभिनय के तरीके और संघर्ष पर भी बात की। उन्होंने कहा कि फिल्म ‘चाणक्य’ में उन्होंने 28 टेक दिए थे, जबकि अब वह एक टेक में काम करने की कोशिश करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह पढ़ाई में कभी बहुत अच्छे नहीं रहे और इतिहास पढ़ने के बजाय उसे देखना चाहते थे। उन्होंने बताया कि आज भी वह अपनी स्क्रिप्ट पढ़ने के बजाय उसे अपने तरीके से समझने की कोशिश करते हैं।
‘असफलता का स्वाद चखो, तभी सफलता समझ आएगी’
अभिनय और करियर को लेकर विद्यार्थियों को सलाह देते हुए संजय मिश्रा ने संघर्ष को जरूरी बताया। उन्होंने कहा, “असफलता का स्वाद चखो, तब सफलता का मतलब समझ आएगा।” उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि संघर्ष व्यक्ति का अपना होता है और मौका मिलने पर उसका पूरा फायदा उठाना चाहिए।
मातृभाषा और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश
संजय मिश्रा ने विद्यार्थियों से कहा कि आगे बढ़ना जरूरी है, लेकिन इसके साथ अपनी जमीन और अपनी संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने मातृभाषा के जरिए अपनी संस्कृति से जुड़े रहने की बात कही और विद्यार्थियों को पढ़ाई को बोझ या तनाव की तरह न लेने की सलाह दी। उनका संदेश था कि नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ते हुए अपनी जड़ों को पहचानना भी उतना ही जरूरी है।
‘अचिंत्य 6.0’ का हुआ विमोचन
कार्यक्रम के दौरान हिंदी प्रकाशन समिति की पत्रिका ‘अचिंत्य 6.0’ का भी विमोचन किया गया। इस अंक का शीर्षक ‘क्षितिज के परे’ रखा गया है। समारोह में प्रोफेसर एसपी सिंह, प्रोफेसर एसके मिश्र, प्रोफेसर मनोज श्रीवास्तव, प्रोफेसर राघव मिश्र, प्रोफेसर रजनीकांत मिश्र और डॉ. भूपेंद्र कुमार समेत विश्वविद्यालय के शिक्षक और अन्य लोग मौजूद रहे। अंत में डॉ. चंद्रशेखर पति त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापन किया और अतिथियों, छात्रों, आयोजकों तथा हिंदी प्रकाशन समिति के सहयोगियों का आभार जताया।



