Thursday, July 16, 2026
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अदालत और थानों में आज भी क्यों गूंजते हैं उर्दू के शब्द? वजह जानकर चौंक जाएंगे आप

By Malay Ojha | Published: 29 May 2026 | 10:36 AM

देश की अदालतों और पुलिस थानों में आज भी कई ऐसे शब्द सुनाई देते हैं, जिनकी जड़ें उर्दू और फारसी भाषा से जुड़ी हुई हैं. “मुकदमा”, “जमानत”, “गवाह”, “मुल्जिम” और “तफ्तीश” जैसे शब्द आज भी सरकारी कामकाज का अहम हिस्सा बने हुए हैं. आधुनिक दौर और नई तकनीक के बावजूद इन शब्दों का इस्तेमाल लगातार जारी है. इसके पीछे भारत का लंबा प्रशासनिक और कानूनी इतिहास जुड़ा हुआ है.

भारत में उर्दू और फारसी भाषा का प्रभाव मुगल शासन के दौरान तेजी से बढ़ा. उस समय फारसी को राजकाज और अदालतों की आधिकारिक भाषा माना जाता था. सरकारी आदेशों से लेकर अदालत के फैसलों तक ज्यादातर काम फारसी में ही होते थे. इसी दौर में अलग-अलग भाषाओं के मेल से उर्दू का विकास हुआ और यह आम लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो गई.

प्रशासनिक व्यवस्था में बढ़ता गया उर्दू का इस्तेमाल
समय के साथ अदालतों, सरकारी दफ्तरों और सैनिक शिविरों में उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल बढ़ने लगा. आम जनता भी इन शब्दों को आसानी से समझने लगी, जिससे प्रशासनिक कामकाज में इन्हें अपनाया गया. धीरे-धीरे ये शब्द सरकारी रिकॉर्ड और कानूनी दस्तावेजों का हिस्सा बन गए.

अंग्रेजों ने पुरानी व्यवस्था को ही जारी रखा
जब अंग्रेजों ने भारत की सत्ता संभाली, तब उन्होंने पूरी न्याय और पुलिस व्यवस्था को बदलने के बजाय पहले से चल रहे सिस्टम को ही जारी रखा. अदालतों और थानों में जो शब्द पहले से इस्तेमाल हो रहे थे, उन्हें अंग्रेजी शासन में भी बनाए रखा गया. बाद में फारसी का प्रभाव कम जरूर हुआ, लेकिन उर्दू के कई शब्द स्थायी रूप से प्रशासनिक भाषा में शामिल हो गए.

कानूनों में दर्ज होने से नहीं बदले शब्द
विशेषज्ञों का मानना है कि अदालतों और पुलिस विभाग में उर्दू शब्दों के बने रहने की सबसे बड़ी वजह कानूनी निरंतरता है. भारतीय दंड संहिता, पुलिस नियमावली और पुराने सरकारी दस्तावेजों में यही शब्द वर्षों से दर्ज हैं. यदि अचानक इन शब्दों को बदल दिया जाए, तो कानूनी व्याख्या और प्रक्रियाओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है.

अधिकारियों की ट्रेनिंग में भी शामिल हैं ये शब्द
पुलिस और न्याय विभाग के अधिकारियों की ट्रेनिंग लंबे समय से इन्हीं शब्दों के साथ होती आ रही है. थानों से लेकर अदालतों तक यही भाषा कामकाज का हिस्सा बन चुकी है. पुराने अधिकारियों से लेकर नई पीढ़ी तक सभी इन शब्दों को आसानी से समझते और इस्तेमाल करते हैं. यही कारण है कि आज भी “मुकदमा”, “जमानत” और “तफ्तीश” जैसे शब्द सरकारी व्यवस्था में मजबूती से कायम हैं.

International

अदालत और थानों में आज भी क्यों गूंजते हैं उर्दू के शब्द? वजह जानकर चौंक जाएंगे आप

By Malay Ojha | Published: 29 May 2026 | 10:36 AM

देश की अदालतों और पुलिस थानों में आज भी कई ऐसे शब्द सुनाई देते हैं, जिनकी जड़ें उर्दू और फारसी भाषा से जुड़ी हुई हैं. “मुकदमा”, “जमानत”, “गवाह”, “मुल्जिम” और “तफ्तीश” जैसे शब्द आज भी सरकारी कामकाज का अहम हिस्सा बने हुए हैं. आधुनिक दौर और नई तकनीक के बावजूद इन शब्दों का इस्तेमाल लगातार जारी है. इसके पीछे भारत का लंबा प्रशासनिक और कानूनी इतिहास जुड़ा हुआ है.

भारत में उर्दू और फारसी भाषा का प्रभाव मुगल शासन के दौरान तेजी से बढ़ा. उस समय फारसी को राजकाज और अदालतों की आधिकारिक भाषा माना जाता था. सरकारी आदेशों से लेकर अदालत के फैसलों तक ज्यादातर काम फारसी में ही होते थे. इसी दौर में अलग-अलग भाषाओं के मेल से उर्दू का विकास हुआ और यह आम लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो गई.

प्रशासनिक व्यवस्था में बढ़ता गया उर्दू का इस्तेमाल
समय के साथ अदालतों, सरकारी दफ्तरों और सैनिक शिविरों में उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल बढ़ने लगा. आम जनता भी इन शब्दों को आसानी से समझने लगी, जिससे प्रशासनिक कामकाज में इन्हें अपनाया गया. धीरे-धीरे ये शब्द सरकारी रिकॉर्ड और कानूनी दस्तावेजों का हिस्सा बन गए.

अंग्रेजों ने पुरानी व्यवस्था को ही जारी रखा
जब अंग्रेजों ने भारत की सत्ता संभाली, तब उन्होंने पूरी न्याय और पुलिस व्यवस्था को बदलने के बजाय पहले से चल रहे सिस्टम को ही जारी रखा. अदालतों और थानों में जो शब्द पहले से इस्तेमाल हो रहे थे, उन्हें अंग्रेजी शासन में भी बनाए रखा गया. बाद में फारसी का प्रभाव कम जरूर हुआ, लेकिन उर्दू के कई शब्द स्थायी रूप से प्रशासनिक भाषा में शामिल हो गए.

कानूनों में दर्ज होने से नहीं बदले शब्द
विशेषज्ञों का मानना है कि अदालतों और पुलिस विभाग में उर्दू शब्दों के बने रहने की सबसे बड़ी वजह कानूनी निरंतरता है. भारतीय दंड संहिता, पुलिस नियमावली और पुराने सरकारी दस्तावेजों में यही शब्द वर्षों से दर्ज हैं. यदि अचानक इन शब्दों को बदल दिया जाए, तो कानूनी व्याख्या और प्रक्रियाओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है.

अधिकारियों की ट्रेनिंग में भी शामिल हैं ये शब्द
पुलिस और न्याय विभाग के अधिकारियों की ट्रेनिंग लंबे समय से इन्हीं शब्दों के साथ होती आ रही है. थानों से लेकर अदालतों तक यही भाषा कामकाज का हिस्सा बन चुकी है. पुराने अधिकारियों से लेकर नई पीढ़ी तक सभी इन शब्दों को आसानी से समझते और इस्तेमाल करते हैं. यही कारण है कि आज भी “मुकदमा”, “जमानत” और “तफ्तीश” जैसे शब्द सरकारी व्यवस्था में मजबूती से कायम हैं.

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