By Malay Ojha | Published: 12 July 2026 | 03:30 PM
कई साल तक पुलिस थाने में खाकी वर्दी धोकर बेटे की पढ़ाई का खर्च उठाने वाली मां की मेहनत आखिर रंग लाई। वैशाली जिले के धर्मेंद्र कुमार ने बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सफलता हासिल कर राजस्व अधिकारी का पद पाया है। लेकिन उनकी मंजिल अभी खत्म नहीं हुई है। अब उनका सपना पुलिस उपाधीक्षक बनकर अपनी मां के सामने उसी खाकी वर्दी में खड़ा होना है, जिसे धोते हुए मां ने अपनी पूरी जिंदगी गुजार दी।
हर बड़ी सफलता के पीछे कोई न कोई संघर्ष छिपा होता है। धर्मेंद्र कुमार की कहानी भी ऐसी ही है। उनका परिवार आर्थिक रूप से बेहद साधारण रहा। पिता दिहाड़ी मजदूरी करके घर चलाते रहे, जबकि मां रेखा देवी ने करीब दो दशक तक जंदाहा थाना में पुलिसकर्मियों की वर्दियां धोकर परिवार का सहारा बनाया।
पढ़ाई के लिए मां ने नहीं छोड़ी मेहनत
रेखा देवी ने कभी अपनी परेशानी बेटे की पढ़ाई के आड़े नहीं आने दी। पुलिस की वर्दियां धोकर जो भी कमाई होती, उसका बड़ा हिस्सा बेटे की पढ़ाई पर खर्च कर देती थीं। परिवार की आय सीमित थी, लेकिन बेटे को पढ़ाने का हौसला कभी कम नहीं हुआ। धर्मेंद्र भी माता-पिता की मेहनत को समझते थे और पढ़ाई में लगातार जुटे रहे।
बीपीएससी में मिली बड़ी सफलता
लगातार मेहनत का नतीजा तब सामने आया, जब धर्मेंद्र कुमार ने बिहार लोक सेवा आयोग की संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा में सफलता हासिल की। उन्होंने परीक्षा में सत्तरवीं रैंक प्राप्त की और राजस्व अधिकारी के पद के लिए चयनित हुए। साधारण परिवार से निकलकर इस मुकाम तक पहुंचना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
पूरे इलाके के लिए बने प्रेरणा
धर्मेंद्र की सफलता की खबर फैलते ही गांव और आसपास के लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। एक धोबी परिवार के बेटे ने प्रतियोगी परीक्षा में सफलता हासिल कर यह साबित कर दिया कि मेहनत और लगन के सामने आर्थिक तंगी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सकती। आज उनकी कहानी उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन रही है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं।
मंजिल अभी बाकी, अब खाकी पहनने की तैयारी
राजस्व अधिकारी बनने के बाद भी धर्मेंद्र ने अपने सपनों को विराम नहीं दिया है। उनका कहना है कि उनका असली लक्ष्य पुलिस उपाधीक्षक बनना है। इसके लिए वह एक बार फिर से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में जुट गए हैं।
मां के लिए पहनना चाहते हैं वही वर्दी
धर्मेंद्र कहते हैं कि उनकी मां ने वर्षों तक दूसरों की पुलिस वर्दी धोकर उन्हें पढ़ाया है। अब वह चाहते हैं कि एक दिन उनकी मां उन्हें उसी खाकी वर्दी में देखें। उनके लिए यह सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि मां की वर्षों की मेहनत और त्याग का सम्मान होगा।
संघर्ष से मिली सबसे बड़ी सीख
धर्मेंद्र की कहानी यह बताती है कि सफलता किसी की आर्थिक स्थिति नहीं देखती। अगर इरादे मजबूत हों और परिवार का साथ मिले तो कठिन से कठिन परिस्थितियां भी रास्ता नहीं रोक सकतीं। उनकी सफलता उन युवाओं के लिए संदेश है, जो संसाधनों की कमी को अपनी हार मान लेते हैं।



