By Malay Ojha | Published: 26 July 2026 | 10:38 PM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की परीक्षा व्यवस्था में सुधार और उसे ज्यादा भरोसेमंद बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। 26 जुलाई को उन्होंने नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में परीक्षा सुधारों के लिए एक उच्चस्तरीय टास्क फोर्स के गठन की घोषणा की। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। अब इस पूरी व्यवस्था को मजबूत करने की जिम्मेदारी उस शख्स को मिली है, जिसने भारत की तकनीकी दुनिया को वैश्विक पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई है।
नंदन नीलेकणि को आमतौर पर इंफोसिस के सह-संस्थापक और आधार परियोजना से जुड़े प्रमुख चेहरों में गिना जाता है। लेकिन उनकी पहचान सिर्फ एक सफल कारोबारी या तकनीकी विशेषज्ञ तक सीमित नहीं है। बड़े स्तर पर तकनीक और व्यवस्था को संभालने का उनका अनुभव अब देश की परीक्षा प्रणाली में काम आ सकता है। प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद नीलेकणि की शैक्षणिक यात्रा और उनके अब तक के सफर को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।
बेंगलुरु में जन्म, धारवाड़ से शुरू हुई पढ़ाई
नंदन नीलेकणि का जन्म 1955 में बेंगलुरु में हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई कर्नाटक के धारवाड़ में हुई। इसके बाद उन्होंने देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान आईआईटी बॉम्बे का रुख किया। यहीं से उनके जीवन की दिशा तेजी से बदलने लगी और उन्होंने तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में अपनी मजबूत नींव तैयार की।
आईआईटी बॉम्बे के उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक नीलेकणि ने 1978 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री हासिल की। आईआईटी बॉम्बे के एक परिचय में उनके पांच साल के संस्थान जीवन को उनके जीवन के निर्णायक अनुभवों में से एक बताया गया है। यही तकनीकी शिक्षा आगे चलकर उनके पेशेवर जीवन की सबसे बड़ी ताकत बनी।
पढ़ाई के बाद शुरू हुआ तकनीकी दुनिया का सफर
आईआईटी बॉम्बे से पढ़ाई पूरी करने के बाद नंदन नीलेकणि ने अपने पेशेवर करियर की शुरुआत पटनी कंप्यूटर सिस्टम्स से की। इसी दौर में उनकी मुलाकात नारायण मूर्ति से हुई। यह मुलाकात आगे चलकर भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग के इतिहास की सबसे चर्चित साझेदारियों में बदल गई।
1981 में नंदन नीलेकणि ने नारायण मूर्ति और पांच अन्य सह-संस्थापकों के साथ मिलकर इंफोसिस की नींव रखी। शुरुआती दौर में यह कंपनी एक छोटे से उद्यम के रूप में शुरू हुई थी, लेकिन आने वाले वर्षों में उसने भारतीय तकनीकी उद्योग को दुनिया के नक्शे पर एक अलग पहचान दिलाई। नीलेकणि ने कंपनी के विकास में अलग-अलग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं और रणनीति, बिक्री तथा संचालन से जुड़े क्षेत्रों में अहम भूमिका निभाई।
इंफोसिस में संभाली बड़ी जिम्मेदारियां
नंदन नीलेकणि का इंफोसिस के साथ जुड़ाव सिर्फ सह-संस्थापक तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कंपनी में प्रबंध निदेशक, अध्यक्ष और मुख्य संचालन अधिकारी समेत कई अहम जिम्मेदारियां संभालीं। बाद में वे मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी बने। उनके नेतृत्व में इंफोसिस ने वैश्विक स्तर पर अपनी मौजूदगी और मजबूत की।
कंपनी से जुड़े उनके लंबे अनुभव ने उन्हें सिर्फ तकनीक का जानकार नहीं बनाया, बल्कि बड़े संगठनों को संभालने, लंबे समय की रणनीति तैयार करने और बड़े पैमाने पर तकनीकी व्यवस्था खड़ी करने का अनुभव भी दिया। यही वजह है कि आज जब देश की परीक्षा प्रणाली में बड़े सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है, तब उनकी विशेषज्ञता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आधार परियोजना से मिली नई पहचान
इंफोसिस के बाद नंदन नीलेकणि ने सार्वजनिक क्षेत्र में भी बड़ी जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2009 में उन्हें भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण यानी यूआईडीएआई का संस्थापक अध्यक्ष बनाया गया। इस भूमिका में उन्होंने देश की आधार पहचान व्यवस्था को आकार देने और उसे बड़े स्तर पर लागू करने की प्रक्रिया का नेतृत्व किया।
आधार जैसी विशाल पहचान व्यवस्था को देश के करोड़ों लोगों तक पहुंचाने का काम तकनीक और प्रशासन, दोनों स्तरों पर बेहद चुनौतीपूर्ण था। इस जिम्मेदारी ने नीलेकणि की पहचान को कारोबारी दुनिया से बाहर भी मजबूत किया और उन्हें बड़े पैमाने की सार्वजनिक तकनीकी परियोजनाओं को संभालने वाले प्रमुख विशेषज्ञों में शामिल कर दिया।
फिर इंफोसिस में लौटे, अब परीक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी
आधार परियोजना में अपनी भूमिका के बाद नंदन नीलेकणि 2017 में इंफोसिस के गैर-कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर कंपनी से फिर जुड़े। इसके अलावा वे शिक्षा और तकनीक से जुड़े कई प्रयासों से भी जुड़े रहे हैं। इंफोसिस के अनुसार वे एक ऐसी संस्था के सह-संस्थापक और अध्यक्ष भी हैं, जो तकनीक के माध्यम से बच्चों की बुनियादी साक्षरता और गणितीय क्षमता को बेहतर बनाने की दिशा में काम करती है।
अब सबसे बड़ी चुनौती परीक्षा व्यवस्था को भरोसेमंद बनाना
नंदन नीलेकणि के सामने अब जो जिम्मेदारी है, उसका सीधा संबंध देश के करोड़ों विद्यार्थियों के भविष्य से है। परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, तकनीक का बेहतर इस्तेमाल, पेपर लीक जैसी घटनाओं पर रोक और परीक्षा प्रक्रिया में छात्रों का भरोसा कायम करना इस समय सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल हैं।
ऐसे में आईआईटी बॉम्बे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले नंदन नीलेकणि का तकनीकी और प्रबंधन अनुभव नई जिम्मेदारी में कितना असरदार साबित होता है, इस पर सबकी नजर रहेगी। एक तरफ उनके सामने देश की विशाल परीक्षा व्यवस्था को ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ विद्यार्थियों और अभिभावकों का भरोसा वापस जीतना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
शिक्षा से तकनीक और अब परीक्षा सुधार तक
नंदन नीलेकणि का सफर एक ऐसे छात्र से शुरू हुआ, जिसने आईआईटी बॉम्बे में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद वे भारतीय तकनीकी उद्योग के निर्माण में शामिल हुए, इंफोसिस को वैश्विक पहचान दिलाने वाली टीम का हिस्सा बने और फिर आधार जैसी देशव्यापी पहचान व्यवस्था से जुड़े। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गठित परीक्षा सुधारों की उच्चस्तरीय टास्क फोर्स की कमान उनके हाथ में है।
यानी नंदन नीलेकणि की कहानी सिर्फ एक सफल कारोबारी की कहानी नहीं है। यह तकनीकी शिक्षा, निजी क्षेत्र, सार्वजनिक व्यवस्था और बड़े स्तर पर डिजिटल बदलाव से जुड़ा लंबा अनुभव है। अब देखना होगा कि यही अनुभव देश की परीक्षा व्यवस्था को कितना बदल पाता है और विद्यार्थियों के लिए एक ऐसी प्रणाली तैयार करने में कितना मददगार साबित होता है, जिस पर वे बिना किसी संदेह के भरोसा कर सकें।



