By Malay Ojha | Published: 27 June 2026 | 11:50 AM
सीयूईटी यूजी 2026 के नतीजे जारी होने के बाद देशभर के हजारों छात्रों ने नॉर्मलाइजेशन प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कई छात्रों का दावा है कि प्रोविजनल और फाइनल आंसर-की के आधार पर उनके जितने अंक बन रहे थे, अंतिम परिणाम में उससे 40 से 50 तक कम अंक दिए गए। छात्रों ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी से पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक करने की मांग की है और सोशल मीडिया पर भी नाराजगी जाहिर की है।
परिणाम घोषित होते ही कई छात्र सोशल मीडिया पर अपने स्कोरकार्ड साझा करने लगे। उनका कहना है कि उन्होंने आधिकारिक आंसर-की के आधार पर खुद अपने अंक जोड़े थे, लेकिन अंतिम परिणाम आने पर अंक काफी कम दिखाई दिए। कुछ छात्रों का दावा है कि इस अंतर की वजह से उनकी रैंकिंग प्रभावित हुई है और अब पसंदीदा विश्वविद्यालय में दाखिले की उम्मीद भी कमजोर पड़ सकती है।
40 से 50 अंक तक घटने का दावा
कई छात्रों ने आरोप लगाया है कि उनके अंक 40 से 50 तक कम कर दिए गए हैं। कुछ मामलों में यह अंतर इससे भी ज्यादा बताया जा रहा है। एक छात्रा ने दावा किया कि आंसर-की के हिसाब से उसके 815 अंक बन रहे थे, लेकिन अंतिम परिणाम में उसे 710 अंक मिले। ऐसे दावों के बाद नॉर्मलाइजेशन को लेकर बहस और तेज हो गई है।
NTA से पारदर्शिता की मांग
छात्रों का कहना है कि एजेंसी को यह साफ करना चाहिए कि किस शिफ्ट का प्रश्नपत्र कितना कठिन था और किस आधार पर किसी शिफ्ट के अंक बढ़ाए या घटाए गए। उनका कहना है कि यदि पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक है तो उससे जुड़े आंकड़ों को सार्वजनिक करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।
आखिर क्यों होता है नॉर्मलाइजेशन?
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के सूत्रों के मुताबिक, सीयूईटी परीक्षा कई दिनों और अलग-अलग शिफ्टों में आयोजित होती है। परीक्षा कंप्यूटर आधारित होने के कारण हर शिफ्ट में प्रश्नपत्र अलग होता है और उनके कठिनाई स्तर में भी अंतर हो सकता है। इसी अंतर को संतुलित करने के लिए नॉर्मलाइजेशन लागू किया जाता है।
एजेंसी का कहना है कि इस प्रक्रिया के बाद कुछ छात्रों के अंक बढ़ जाते हैं तो कुछ छात्रों के अंक कम भी हो सकते हैं। इसका मकसद सभी अभ्यर्थियों को समान अवसर देना है।
कौन-कौन से आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग?
छात्र चाहते हैं कि प्रत्येक शिफ्ट में शामिल उम्मीदवारों की संख्या, किस राज्य से कितने छात्रों ने परीक्षा दी, किस शिफ्ट में कितने प्रतिशत अंक बढ़े या घटे और कठिनाई स्तर का निर्धारण किस आधार पर किया गया, इसकी जानकारी सार्वजनिक की जाए।
उनका कहना है कि अलग-अलग परीक्षा केंद्रों और शिफ्टों के लिए एक जैसी प्रक्रिया लागू करने से कई बार छात्रों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
शिक्षा विशेषज्ञों ने भी उठाए सवाल
कुछ शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सभी प्रश्नपत्र लगभग समान स्तर के तैयार किए जाते हैं तो नॉर्मलाइजेशन की जरूरत पर फिर से विचार किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि लगातार उठ रहे सवाल छात्रों और अभिभावकों के भरोसे को प्रभावित कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि एजेंसी को छात्रों की शिकायतों की समीक्षा करनी चाहिए और पूरी प्रक्रिया को और ज्यादा पारदर्शी बनाने के लिए विस्तृत रिपोर्ट जारी करनी चाहिए।
अब आगे क्या?
फिलहाल छात्रों ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी को शिकायत भेजी है और कई अभ्यर्थी सोशल मीडिया के जरिए अपनी मांग उठा रहे हैं। आने वाले दिनों में यदि एजेंसी इस मुद्दे पर कोई स्पष्टीकरण जारी करती है तो इससे छात्रों की शंकाएं दूर हो सकती हैं। फिलहाल हजारों छात्र इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि आखिर उनके अंक अचानक कैसे कम हो गए।



