Friday, May 29, 2026
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3 बार असफल होने के बाद भी नहीं टूटा हौसला, गांव के सूरज ने बनकर दिखाया आईपीएस अफसर

टैगोर एजुकेशन टाइम्स टीम | Published: 28 May 2026 | 05:36 PM

देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में गिनी जाने वाली यूपीएससी को पास करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। कई उम्मीदवार सालों तक तैयारी करते रहते हैं, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगती। वहीं कुछ लोग तमाम मुश्किलों और असफलताओं के बावजूद अपने सपने को छोड़ते नहीं हैं। ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है उत्तर प्रदेश के जौनपुर के रहने वाले सूरज सिंह परिहार की, जिन्होंने संघर्षों से लड़ते हुए आखिरकार आईपीएस अफसर बनने का सपना पूरा कर दिखाया।

सूरज सिंह परिहार की शुरुआती पढ़ाई गांव के ही स्कूल से हुई। पांचवीं कक्षा के बाद उनका परिवार कानपुर के जाजमऊ इलाके में आ गया, जहां उन्होंने हिंदी माध्यम से आगे की पढ़ाई जारी रखी। पढ़ाई में तेज होने की वजह से वह बचपन से ही प्रतिभाशाली छात्रों में गिने जाते थे।

राष्ट्रपति से मिला सम्मान, लेकिन महसूस हुई कमी
साल 2000 में सूरज सिंह परिहार को तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने राष्ट्रीय बाल श्री पुरस्कार से सम्मानित किया था। इस सम्मान समारोह में उन्होंने कई ऐसे बच्चों को देखा जो धाराप्रवाह अंग्रेजी बोल रहे थे। उसी समय उन्हें महसूस हुआ कि अंग्रेजी बोलने में वह पीछे हैं। इसके बाद उन्होंने खुद पर काम करना शुरू किया। अंग्रेजी अखबार पढ़ना, समाचार चैनल देखना और शीशे के सामने बोलने की प्रैक्टिस उनकी दिनचर्या बन गई।

आर्थिक तंगी में खोला छोटा कोचिंग सेंटर
बारहवीं की परीक्षा में सूरज ने 81 प्रतिशत अंक हासिल किए, लेकिन इसके बाद परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। ऐसे समय में उन्होंने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर छोटा कोचिंग सेंटर शुरू किया ताकि पढ़ाई और घर दोनों का खर्च चल सके।

कॉल सेंटर की नौकरी में भी किया संघर्ष
कुछ समय बाद उन्हें कॉल सेंटर में नौकरी मिल गई, लेकिन यहां भी मुश्किलें कम नहीं थीं। शुरुआती वॉयस और एक्सेंट टेस्ट में वह फेल हो गए थे। कंपनी ने उन्हें नौकरी छोड़ने तक के लिए कह दिया था। हालांकि उन्होंने मौका मांगा और खुद को साबित किया। मेहनत के दम पर बाद में वह उसी कंपनी के टॉप परफॉर्मर बन गए।

बैंक की नौकरी करते हुए जारी रखी तैयारी
सूरज सिंह का सपना प्रशासनिक सेवा में जाने का था। इसलिए उन्होंने नौकरी छोड़कर दिल्ली जाकर यूपीएससी की तैयारी शुरू की। लेकिन कुछ ही महीनों में उनकी जमा पूंजी खत्म हो गई। आर्थिक संकट से निकलने के लिए उन्होंने कई बैंकों की प्रोबेशनरी ऑफिसर परीक्षा दी और सभी में सफलता हासिल की।

इसके बाद उन्होंने बैंक ऑफ महाराष्ट्र में नौकरी की और बाद में भारतीय स्टेट बैंक में मैनेजर पद तक पहुंचे। हालांकि नौकरी के साथ भी उनका लक्ष्य यूपीएससी ही रहा। आखिरकार उन्होंने बैंक की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह तैयारी में जुट गए।

लगातार असफलता के बाद भी नहीं मानी हार
साल 2011 में सूरज सिंह परिहार यूपीएससी इंटरव्यू तक पहुंचे, लेकिन अंतिम चयन नहीं हो सका। अगले साल वह मुख्य परीक्षा भी पास नहीं कर पाए। लगातार दो असफलताओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और तीसरे प्रयास में फिर परीक्षा दी।

साल 2013 में उन्हें सफलता मिली और उनका चयन भारतीय राजस्व सेवा के लिए हो गया। हालांकि उनका सपना आईपीएस अफसर बनने का था, लेकिन निर्धारित प्रयास पूरे हो चुके थे।

नीति बदली और पूरा हुआ आईपीएस बनने का सपना
इसी बीच सरकार ने यूपीएससी में प्रयासों की संख्या बढ़ा दी। यह सूरज सिंह परिहार के लिए बड़ा मौका साबित हुआ। उन्होंने एक बार फिर परीक्षा दी और शानदार 189वीं रैंक हासिल कर आईपीएस अफसर बन गए। उनकी कहानी बताती है कि मेहनत, धैर्य और आत्मविश्वास के दम पर कोई भी सपना पूरा किया जा सकता है।

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3 बार असफल होने के बाद भी नहीं टूटा हौसला, गांव के सूरज ने बनकर दिखाया आईपीएस अफसर

टैगोर एजुकेशन टाइम्स टीम | Published: 28 May 2026 | 05:36 PM

देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में गिनी जाने वाली यूपीएससी को पास करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। कई उम्मीदवार सालों तक तैयारी करते रहते हैं, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगती। वहीं कुछ लोग तमाम मुश्किलों और असफलताओं के बावजूद अपने सपने को छोड़ते नहीं हैं। ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है उत्तर प्रदेश के जौनपुर के रहने वाले सूरज सिंह परिहार की, जिन्होंने संघर्षों से लड़ते हुए आखिरकार आईपीएस अफसर बनने का सपना पूरा कर दिखाया।

सूरज सिंह परिहार की शुरुआती पढ़ाई गांव के ही स्कूल से हुई। पांचवीं कक्षा के बाद उनका परिवार कानपुर के जाजमऊ इलाके में आ गया, जहां उन्होंने हिंदी माध्यम से आगे की पढ़ाई जारी रखी। पढ़ाई में तेज होने की वजह से वह बचपन से ही प्रतिभाशाली छात्रों में गिने जाते थे।

राष्ट्रपति से मिला सम्मान, लेकिन महसूस हुई कमी
साल 2000 में सूरज सिंह परिहार को तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने राष्ट्रीय बाल श्री पुरस्कार से सम्मानित किया था। इस सम्मान समारोह में उन्होंने कई ऐसे बच्चों को देखा जो धाराप्रवाह अंग्रेजी बोल रहे थे। उसी समय उन्हें महसूस हुआ कि अंग्रेजी बोलने में वह पीछे हैं। इसके बाद उन्होंने खुद पर काम करना शुरू किया। अंग्रेजी अखबार पढ़ना, समाचार चैनल देखना और शीशे के सामने बोलने की प्रैक्टिस उनकी दिनचर्या बन गई।

आर्थिक तंगी में खोला छोटा कोचिंग सेंटर
बारहवीं की परीक्षा में सूरज ने 81 प्रतिशत अंक हासिल किए, लेकिन इसके बाद परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। ऐसे समय में उन्होंने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर छोटा कोचिंग सेंटर शुरू किया ताकि पढ़ाई और घर दोनों का खर्च चल सके।

कॉल सेंटर की नौकरी में भी किया संघर्ष
कुछ समय बाद उन्हें कॉल सेंटर में नौकरी मिल गई, लेकिन यहां भी मुश्किलें कम नहीं थीं। शुरुआती वॉयस और एक्सेंट टेस्ट में वह फेल हो गए थे। कंपनी ने उन्हें नौकरी छोड़ने तक के लिए कह दिया था। हालांकि उन्होंने मौका मांगा और खुद को साबित किया। मेहनत के दम पर बाद में वह उसी कंपनी के टॉप परफॉर्मर बन गए।

बैंक की नौकरी करते हुए जारी रखी तैयारी
सूरज सिंह का सपना प्रशासनिक सेवा में जाने का था। इसलिए उन्होंने नौकरी छोड़कर दिल्ली जाकर यूपीएससी की तैयारी शुरू की। लेकिन कुछ ही महीनों में उनकी जमा पूंजी खत्म हो गई। आर्थिक संकट से निकलने के लिए उन्होंने कई बैंकों की प्रोबेशनरी ऑफिसर परीक्षा दी और सभी में सफलता हासिल की।

इसके बाद उन्होंने बैंक ऑफ महाराष्ट्र में नौकरी की और बाद में भारतीय स्टेट बैंक में मैनेजर पद तक पहुंचे। हालांकि नौकरी के साथ भी उनका लक्ष्य यूपीएससी ही रहा। आखिरकार उन्होंने बैंक की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह तैयारी में जुट गए।

लगातार असफलता के बाद भी नहीं मानी हार
साल 2011 में सूरज सिंह परिहार यूपीएससी इंटरव्यू तक पहुंचे, लेकिन अंतिम चयन नहीं हो सका। अगले साल वह मुख्य परीक्षा भी पास नहीं कर पाए। लगातार दो असफलताओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और तीसरे प्रयास में फिर परीक्षा दी।

साल 2013 में उन्हें सफलता मिली और उनका चयन भारतीय राजस्व सेवा के लिए हो गया। हालांकि उनका सपना आईपीएस अफसर बनने का था, लेकिन निर्धारित प्रयास पूरे हो चुके थे।

नीति बदली और पूरा हुआ आईपीएस बनने का सपना
इसी बीच सरकार ने यूपीएससी में प्रयासों की संख्या बढ़ा दी। यह सूरज सिंह परिहार के लिए बड़ा मौका साबित हुआ। उन्होंने एक बार फिर परीक्षा दी और शानदार 189वीं रैंक हासिल कर आईपीएस अफसर बन गए। उनकी कहानी बताती है कि मेहनत, धैर्य और आत्मविश्वास के दम पर कोई भी सपना पूरा किया जा सकता है।

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