By Malay Ojha | Published: 01 July 2026 | 03:45 PM
यूरोप में भीषण हीटवेव के बीच करीब 1300 लोगों की मौत का दावा किया गया है। कई देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। सवाल यह है कि जब भारत के कई इलाकों में 45 से 50 डिग्री तापमान भी देखने को मिलता है, तब यूरोप में 40 डिग्री ही इतनी खतरनाक कैसे साबित हो रही है? इसका जवाब सिर्फ तापमान में नहीं, बल्कि शरीर की गर्मी सहने की क्षमता, हवा में नमी और हीट इंडेक्स जैसे वैज्ञानिक कारणों में छिपा है।
भारत के कई हिस्सों में लोग लंबे समय से तेज गर्मी झेलते आए हैं, इसलिए यहां के लोगों का शरीर कुछ हद तक ऐसी परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल चुका है। वहीं यूरोप के अधिकांश देशों में इतनी भीषण गर्मी सामान्य नहीं मानी जाती। वहां घरों, दफ्तरों और सार्वजनिक सुविधाओं की व्यवस्था भी लंबे समय तक तेज गर्मी को ध्यान में रखकर विकसित नहीं हुई। यही वजह है कि तापमान बढ़ने पर वहां स्वास्थ्य संकट तेजी से गहराने लगता है।
सिर्फ तापमान नहीं, हीट इंडेक्स तय करता है खतरा
अधिकांश लोगों को लगता है कि केवल 45 या 50 डिग्री तापमान ही जानलेवा होता है, लेकिन वैज्ञानिक इससे सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि शरीर पर पड़ने वाला वास्तविक असर हीट इंडेक्स से तय होता है। हीट इंडेक्स तापमान और हवा में मौजूद नमी को मिलाकर बताता है कि इंसान को वास्तव में कितनी गर्मी महसूस होगी।
अगर तापमान 38 डिग्री हो और हवा में नमी 70 प्रतिशत के आसपास हो, तो शरीर को यह गर्मी 45 डिग्री या उससे भी ज्यादा महसूस हो सकती है। ऐसे हालात में शरीर के लिए खुद को ठंडा रखना बेहद मुश्किल हो जाता है।
शरीर खुद को कैसे ठंडा रखता है?
स्वस्थ इंसान के शरीर का सामान्य तापमान लगभग 37 डिग्री सेल्सियस रहता है। जब बाहर गर्मी बढ़ती है तो शरीर पसीना निकालता है। पसीना त्वचा से उड़कर शरीर की अतिरिक्त गर्मी बाहर निकाल देता है। यही प्रक्रिया शरीर को सामान्य तापमान पर बनाए रखने में मदद करती है।
जब तक पसीना आसानी से सूखता रहता है, तब तक शरीर गर्मी से लड़ता रहता है। लेकिन जैसे ही यह प्रक्रिया रुकती है, खतरा तेजी से बढ़ने लगता है।
नमी बढ़ते ही क्यों बिगड़ जाते हैं हालात?
तेज गर्मी के साथ अगर हवा में नमी भी ज्यादा हो तो पसीना आसानी से नहीं सूखता। ऐसे में शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती और अंदर का तापमान लगातार बढ़ने लगता है।
यही वजह है कि कई बार अपेक्षाकृत कम तापमान भी इंसान के लिए ज्यादा खतरनाक साबित हो जाता है। लंबे समय तक धूप में काम करना, पर्याप्त पानी नहीं पीना, लगातार मेहनत करना या बंद और गर्म कमरों में रहना जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है।
कब बनती है हीट स्ट्रोक जैसी जानलेवा स्थिति?
जब शरीर का तापमान लगभग 40 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर पहुंच जाता है, तब हीट स्ट्रोक का खतरा पैदा हो जाता है। यह सामान्य बीमारी नहीं बल्कि मेडिकल इमरजेंसी होती है।
अगर समय पर इलाज नहीं मिले तो दिमाग, दिल, फेफड़े, किडनी समेत कई महत्वपूर्ण अंग प्रभावित हो सकते हैं। गंभीर मामलों में मरीज की जान भी जा सकती है।
किन लोगों पर सबसे ज्यादा खतरा रहता है?
विशेषज्ञों के मुताबिक कुछ लोगों में हीट स्ट्रोक का जोखिम सामान्य लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा होता है। इनमें 60 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं, खेतों और निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर, फैक्ट्री कर्मी तथा हृदय, मधुमेह और किडनी की बीमारी से जूझ रहे मरीज शामिल हैं।
इन लोगों का शरीर अत्यधिक गर्मी से मुकाबला करने में अपेक्षाकृत कमजोर होता है, इसलिए थोड़ी सी लापरवाही भी गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है।
पानी की कमी भी बन सकती है मौत की वजह
भीषण गर्मी में लगातार पसीना निकलने से शरीर से पानी के साथ जरूरी मिनरल और इलेक्ट्रोलाइट्स भी बाहर निकलते रहते हैं। अगर समय रहते पानी, ओआरएस या अन्य तरल पदार्थ नहीं लिए जाएं तो डिहाइड्रेशन बढ़ जाता है।
डिहाइड्रेशन होने पर खून का प्रवाह प्रभावित होता है और शरीर की तापमान नियंत्रित करने की क्षमता कमजोर पड़ने लगती है। यही स्थिति आगे चलकर हीट स्ट्रोक और मौत का खतरा बढ़ा देती है।
गर्मी से बचने के लिए क्या करें?
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि दोपहर की तेज धूप में लंबे समय तक बाहर रहने से बचें। प्यास लगने का इंतजार करने के बजाय नियमित अंतराल पर पानी पीते रहें। हल्के और सूती कपड़े पहनें, बंद और गर्म कमरों में ज्यादा देर न रहें तथा चक्कर आना, तेज बुखार, उलझन या बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। समय पर इलाज ही हीट स्ट्रोक से जान बचाने का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।



